● विलाप

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नान्हिएटा छलहुँ, दूध पिबैत रही
राजा-रानीक कथा सुनैत रही
घर-आङ्गनमे ओंघड़ाइ छलहुँ
कनिया-पुतरा खेलाइ छलहुँ
मन ने पड़ै अछि, केना रही
लोक कहै अछि, नेना रही
माएक कोरामे दूध पिबैत
बैसल छलहुँ उँघाइत झुकैत

परतारिक’ मड़वापर बहिन ल’ गेल
की दन कहाँ दन भेलै, विआह भ’ गेल
पएरमे होमक काठी गड़ल
सीथमे जहिना सिन्नूर पड़ल
वर मुदा अनचिन्हार छलाह
फूसि ने कहब, गोर नार छलाह
अवस्था रहिन्ह बारहक करीब
पढ़ब गुनब तहूमे बड़ दीब

अंगनहिमे बजलै किदन ई कथा
सुमरि सुमरि आइ होइए व्यथा
सत्ते कहै छी, हम ने जनलियै
हँसलियैक ने, ने कने कनलियै
बाबू जखन मानि लेलथिन
सोझे वर्षे दुरागमनक दिन
सिखौलापर हम कानब सीखल
कपारमे मुदा छल कनबे लीखल

सिन्नुर लहठी छल सोहागक चिन्ह
हम बुझियै ने किछु उहए बुझथिन्ह
रहै लगलहुँ भाइ-बहिनजकाँ
खेलाए लगलहुँ राति-दिनजकाँ
कोनो वस्तुक नहि छल बिथूति
कलेसक ने नाम दुखक ने छूति
होम’ लागल यौवन उदित
होम’ लागल प्रेम अंकुरित

बारहम उतरल, तेरहम चढ़ल
ज्ञान भेल रसक, सिनेह बढ़ल
ओहो भ’ गेलाह बेस समर्थ
बुझै लगलाह संकेतक अर्थ
सुखक दिन लग चलि अबैत रहै
मन आशाक मलार गबैत रहै
बन्हैत रही बेस मनोरथक पुल
विधाता बूझि पड़ै छल अनुकूल

दनादन दिन बितैत रहै
अभागली हएब, से केओ ने कहै
एक दिन उठलन्हि हुनका दर्द
टोलभरिमे भ’ गेल आसमर्द
कते वैद डाकदर बजाओल गेलाह
तइँयो ने हाय ओ नीके भेलाह
बहार क’ देलकन्हि लोग आबिक’
जान ल’ लेलकन्हि रोग आबिक’

बैतरणीमे उसरगल गेलन्हि बाछी
उठा क’ ल’ जाइत गेलथन्हि गाछी
पोखरिपर लहठी फूटल हमर
सीथसँ सिन्नूर छूटल हमर

ठोहि पाड़िक’ हकन कनैत रही

एना हएत से की जनैत रही ?

लगै अछि चारूदिस अन्हारजकाँ
ने बुझि पड़ै कियो चिन्हारजकाँ

विषसन अवस्था, पहाड़सन जीवन
संसारमे हम के अछि अपन ?
कानी तँ चुप कएनिहार केओ नहि
रूसी तँ बौँसनिहार केओ नहि
हम पड़ल छी टूटल पुलजकाँ
मौलाएल, बिनु सूँघल फूलजकाँ
आगि छूबै छी तँ जरैत ने छी
माहुर खाइ छी तँ मरैत ने छी

कोढ़ फाटै मुदा ने जाए जान
कोन पाप कएने छलहुँ हे भगवान
भरल आङ्गन सुन्न हमरा लगै
फूजल घर निमुन्न हमरा लगै
लोक अलच्छि बुझैए, अशुभ बुझैए
अनेक नहि, से अपनो सुझैए
बिनु बजौने कतौ जाइ ने आबी
मुँहमे लगौने रहै छी जाबी

भुस्साक आगिजकाँ नहू नहू
जरै छी मने-मने हमहूँ
फटै छी कुसियारक पोरजकाँ
चैतक पछवामे ठोरजकाँ
काते रहै छी जनु घैल छुतहड़
आहि रे हम अभागली कत बड़
भिन्सरे उठि प्रात: स्नान क’ क’
जय करै छी हुनके ध्यान क’ क’

धर्मसँ जीवन बिताब’ चाहै छी
इज्जति बरू बचाब’ चाहै छी
तइँयो करै चाहै छथि हमरा नचार
केहेन केहेन ठोप चानन कएनिहार
ओहनाक सङ्गे जे हम खाधिमे खसी
ओ नुकएले रहताह, हमर हएत हँसी
स्त्रीगणक जाति हम थिकहुँ अबला
तहूपर विधवा, कहू तँ भला !

पुरूषक जाति ओकरा के की कहतै
ओकरे समाज ओकरे बात रहतै
उठा लितथि बरू भगवान हमरो
कथीलए भारी लगितै ककरो ?
मरब तँ केओ कानत नहिएँ
रहब तँ केओ जानत नहिएँ
इहो जीवन कोनो जीवन थीक
एहिसँ कुकुर-बिलाड़िए नीक

माए-बापक मनोरथक शिकार भ’ क’
बेकार भ’ क’, दबल हाहाकार भ’ क’
पँजियाड़ औ’ घटकराजक नामपर
व्यवस्था औ’ समाजक नामपर
विधवा हमरेसन हजारक हजार
बहौने जा रहलीह अछि नोरक धार
ओहिमे ई मुलुक डूबि बरू जाए
ओहिमे लोक-वेद भसिया बरू जाए

अगड़ाही लगौ बरू बज्र खसौ
एहने जातिपर बरू धसना धसौ
भूकम्प हौक बरू फटौ धरती
माँ मिथिले रहियेक’ की करती !

– बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’

श्रोत : मिथिला मिरर

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