Maithili poem,इतिहासमे नाम केकर लिखाबै छै ? : युवा सक्षमता दिवस, i love mithila ,Maithili Ghazal ,,Gajendra gajur

प्रस्तुत अछि पाँचटा मैथिली कविता…

मैथिली कविता १ अशल साेना जरै नइँ छै 

गोर लगै छियौ तोरो गै मइयाँ
चरणमे हमे गीरके,
कि देखाबियै, दुनियाँ-दिगर
छातिके दू खण्ड चीरके,

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गै अशल सोना जड़तै नइँ,
अशल बेटा मरतै नइँ,
आ, जे क्याे मायकेँर चीत दुखेतै,
से, भबसागर तरतै नइँ,

हमरे परसादे तो गै मइयाँ
गोदीमे लेने रणे बने , घूमले
अप्पन पेटमे जुन्ना बान्हिक’
हमरे काया सद्खनि जुड़ौले

सेहो कर्जा गै, हम कोना बिसरब
गंगा जुमना नीरकेँ
गोर लगैछियौ तोरो गै मइयाँ
चरणोमे हमे गीरके

मैथिली कविता २ लाेरिक सलहेश मान अछि हमर

नीरशोके हम छी दुनू बेटा
दीना-भद्री नाम अछि हमर,
बजबैछी हौ माटिक सेवा
तिरहुतिया पहिचान अछि हमर,

जँ बात  करू धरातलके यौ
मधेश भक्ति ईमान अछि हमर,
मीठ लगैय मायक बोली
लोरिक सल्हेशके मान अछि हमर,

बुद्ध,बिद्यापति, बन्ठा चमार
कारीख पजियारक गाम अछि हमर,
नजरि उठाबे क्यो सीता पर जँ
नाेछाबर ई प्राण अछि हमर,

गण्डक, कोशी, कमलाकोइला
दूधमत्ती आर बलान अछि हमर,
झूझू नइँ देख ई खढ़’क घर,टहरा
चुह-चुह दुरा-दलान अछि हमर,

मैथिली कविता ३  “येह वर मंगिहें“

अगल-बगल हरबा घुमएबै रे, भैया
कि, चछरीमे मछरी फँसएबै रे,
धनमा कमाईते जे, कनियाँ घौलाईत हेती
खोंइछा भरि मछरी बोकएबै रे,

च’ले धनी घरहीमें ’मछरी’ पकिहें तों
जीतिया नहाँ -खेतै एहि साल टेकीहें,
भेलौ ललनमा तोरो गोदीमे खेलैछौ
आगू-पाछू एक, दू-टा बेटीयो जन्मबीहें

जेबै विदेशबा हे, टक्का कमेबै
कि, सोनेके झुलुवामे टिहुवा झुलैहें
ताेहूँ गढ़ालीहें ’पायल दुलहनियाँ’
गै, अछि घरसँ ओइ घर, तों छ-छम क’ चलीहे

मोनसँ कमेबौ गै, दारु नइँ पीबौ
कि, बेटा आओर बेटीकेँ लंडन पढ़बिहें
घूमी-घूमी’मिथिला,मधेश रचिलएतै
से अइ बेर, जीतिया-जितमाहनसँ येह वर मंगिहें

मैथिली कविता ४ काेशी

सहोदरी गै कोशी,कमला दूधे बहैछे
आन्हर अचेत, आ नांगर लुल्हके सधैछे
उत्तर हिमालय छै बाप सनक पीठ ओढ़ने
दक्षिण, माय गंगाके पैर सोहरैछे

तों एना कानय नइँ दैया आबो किए झखैछेँ
नोर उपछि हमर घर दहबैछे
गै तोहर भाइ अखनो खखरी नइँ भेल छौ
अपने नैहरकेँ किये बहबैछे

ऊ त सतौत भेलै आब
कनेक अपनोंकेँ देख बहीन
गजनोटा लगाकके नइँ
हमरासभकेँ एना ख़ूँरेठ बहीन
ई छै देशकेँ धर्ती, ई छै मिथिला-मधेशकेँ धर्ती
सीता आ बुद्ध सल्हेशकेँ धर्ती
गै गलती कुगलति तँ सभसँ होइ छै
एक बेर अपनो खनदानकेँ त सचेत बहीन

साँस रहिजाय त दुनियाँ देखतै
कौन तरहे हम तोहर डोली सजेबौ
एना ऐंठत- मचारैत नइँ चल बहीन
गै स्वर्गमें तोहर हम घर बसेबौ

मैथिली कविता ५ पुरूषक अस्तित्व कि ?

ध’धरामें मोरा अँचरा जरलै
मुँह पोछिहें आब राखसँ
दुधकेँ धार भलाँ गङे बहि जाए
तों, कंठ जुड़बिहें बाप सँ,

जहिया छलहुँ हम बैरीन-बेटी
नइँ नहिरे बास, नइँ ससुरे बास
रे बेटा ! तोरे चल्तपे हमे रणे-वने घुम्ली
सौंसे नगर आ सौंसे चास

सेहे बेटा मोड़ा जिन्दा जड़ाक’
अमूल्य जिनगी हमर किए केलहाे नास
रे, कहुनाक’ जिनगी काट’ दैते
नइँ छल कहियो हमरा ई आश

पुरुष’क की अस्तित्व भलाँ नारी बिना
कहैछै, एक नदियाके दू-किनार
पतिब्रता धर्म आब सोनित पियैछै
की, पियाबै छै सती, अपन ऐंठी-मचार

गौड़ लगैछियो रे बाबू हमरे जन्मल
बकैस दिह’ आबो नारी परहक अत्याचार
थूक चाटिक’ त’ तहूँ नहि जीबिहे बेटा
कहियो लोहोकेँ दोख आ, कहियो लोहारो करै अत्याचार

सत्य असत्य तँ सभ क्यो जानै छै
आ, होइछै सभ दिन न्याये केर जीत
जानिह’ उगलहा तों छ सभक साखी
पुरुष छै भल मुदा नारी ?

 

गोड़ लगै छियौ तोरो गै मइयाँ
चरणमे हमे गीरके,
कि देखाबियै, दुनियाँ-दिगर
छातिके दू खण्ड चीरके,

गै अशल सोना जड़तै नइँ,
अशल बेटा मरतै नइँ,
आ, जे क्यो माय केर चीत दुखेतै,
से, भबसागर तरतै नइँ,

हमरे परसादे तो गै मइयाँ
गोदीमे लेने रणे बने घुम्ले,
अप्पन पेटमे जुन्ना बान्हि क’
हमरे काया सद्खनि जुड़ौले

सेहो कर्जा गै, हम कोना बिसरब
गंगा जुमना नीरकेँ
गोड़ लगैछियौ तोरो गै मइयाँ
चरणोमे हमे गीरके

मैथिली कविता २ लाेरिक सलहेश मान अछि हमर

नीरशोके हम छी दुनू बेटा
दीना-भद्री नाम अछि हमर,
बजबैछी हौ माटिक सेवा
तिरहुतिया पहिचान अछि हमर,

जँ बात  करू धरातलके यौ
मधेश भक्ति ईमान अछि हमर,
मीठ लगैय मायक बोली
लोरिक सल्हेशके मान अछि हमर,

बुद्ध,बिद्यापति, बन्ठा चमार
कारीख पजियारक गाम अछि हमर,
नजरि उठाबे क्यो सीता पर, जँ
नाेछाबर ई प्राण अछि हमर,

गण्डक, कोशी, कमलाकोइला
दूधमत्ती आर बलान अछि हमर,
झूझू नइँ देख ई खढ़’क घर,टहरा
चुह-चुह दुरा-दलान अछि हमर,

मैथिली कविता ३  “येह वर मंगिहें“

अगल-बगल हरबा घुमएबै रे, भैया
कि, चछरीमे मछरी फँसएबै रे,
धनमा कमाईते जे, कनियाँ घौलाईत हेती
खोंइछा भरि मछरी बोकएबै रे,

च’ले धनी घरहीमें ’मछरी’ पकिहें तों
जीतिया नहाँ -खेतै एहि साल टेकीहें,
भेलौ ललनमा तोरो गोदीमे खेलैछौ
आगू-पाछू एक, दू-टा बेटीयो जन्माबीहें

जेबै विदेशबा हे, टक्का कमेबै
कि, सोनेके झुलुवामे टिहुवा झुलैहें
ताेहूँ गढ़ालीहें ’पायल दुलहनियाँ’
गै, अछि घरसँ ओइ घर, तों छ-छम क’ चलीहे

मोनसँ कमेबौ गै, दारु नइँ पीबौ
कि, बेटा आओर बेटीकेँ लंडन पढ़बिहें
घूमी-घूमी’मिथिला,मधेश रचिलएतै
से अइ बेर, जीतिया-जितमाहनसँ येह वर मंगिहें

मैथिली कविता ४ काेशी

सहोदरी गै कोशी,कमला दूधे बहैछे
आन्हर अचेत, आ नांगर लुल्हके सधैछे
उत्तर हिमालय छै बाप सनक पीठ ओड़ने
दक्षिण, माय गंगाके पैर सोहरैछे

तों एना कानय नइँ दैया आबो किए झखैछेँ
नोर उपछि हमर घर दहबैछे
गै तोहर भाइ अखनो खखरी नइँ भेल छौ
अपने नैहरकेँ किये बहबैछे

ऊ त सतौत भेलै आब
कनेक अपनोंकेँ देख बहीन
गजनोटा लगाकके नइँ
हमरासभकेँ एना ख़ूँरेठ बहीन
ई छै देशकेँ धर्ती, ई छै मिथिला-मधेशकेँ धर्ती
सीता आ बुद्ध सल्हेशकेँ धर्ती
गै गलती कुगलति तँ सभसँ होइ छै
एक बेर अपनो खनदानकेँ त सचेत बहीन

साँस रहिजाय त दुनियाँ देखतै
कौन तरहे हम तोहर डोली सजेबौ
एना ऐंठत- मचारैत नइँ चल बहीन
गै स्वर्गमें तोहर हम घर बसेबौ

मैथिली कविता ५ पुरूषक अस्तित्व कि ?

ध’धरामें मोरा अँचरा जरलै
मुँह पोछिहें आब राखसँ
दुधकेँ धार भलाँ गङे बहि जाए
तों, कंठ जुड़बिहें बाप सँ,

जहिया छलहुँ हम बैरीन-बेटी
नइँ नहिरे बास, नइँ ससुरे बास
रे बेटा ! तोरे चल्तपे हमे रणे-वने घुम्ली
सौंसे नगर आ सौंसे चास

सेहे बेटा मोड़ा जिन्दा जड़ाक’
अमूल्य जिनगी हमर किए केलहाे नास
रे, कहुनाक’ जिनगी काट’ दैते
नइँ छल कहियो हमरा ई आश

पुरुष’क की अस्तित्व भलाँ नारी बिना
कहैछै, एक नदियाके दू-किनार
पतिब्रता धर्म आब सोनित पियैछै
की, पियाबै छै सती, अपन ऐंठी-मचार

गौड़ लगैछियो रे बाबू हमरे जन्मल
बकैस दिह’ आबो नारी परहक अत्याचार
थूक चाटिक’ त’ तहूँ नहि जीबिहे बेटा
कहियो लोहोकेँ दोख आ, कहियो लोहारो करै अत्याचार

सत्य असत्य तँ सभ क्यो जानै छै
आ, होइछै सभ दिन न्याये केर जीत
जानिह’ उगलहा तों छ सभक साखी
पुरुष छै भल मुदा नारी ?

रचनाकार

Maithili poem

बिरेन्द्र कुमार सिंह
अर्नाहा गाउपालिका,सिरहा

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