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गौरवमय परम्पराक धरोहर ‘छठि’ पावनि

धीरेन्द्र प्रेमर्षि

लोकआस्थाक महापर्व- छठि। सूर्यषष्ठीसँ अपभ्रंस होइत षष्ठी आ छठि बनल एक विशिष्ट पावनि, जे प्राचीन तिरहुत/मिथिलाक दोसर महत्त्वपूर्ण भाषा भोजपुरीमे छठी तथा मिथिलाकेँ अपन-अपन नक्सामे समटनिहार दू देश नेपाल आ भारतक प्रमुख भाषा नेपाली आ हिन्दीमे छठ कहाइत अछि। ई मिथिलामे परापूर्व कालसँ चलैत आएल चतुर्दिवसीय धार्मिक/सांस्कृतिक अनुष्ठान अछि।

छठि पाबनि

नदी, पोखरि, तलाव आदि प्राकृतिक तथा कृत्रिम जलाशयक महाड़/कछेरपरसँ पहिने डूबैत सूर्यकेँ आ तखन उगैत सूर्यकेँ अर्घ्य दऽ सम्पन्न कएल जाएवला संसारहिक एक विशिष्ट एवं विलक्षण पावनिक रूपमे प्रतिष्ठापित अछि छठि। साविकमे मिथिलाक सर्वाधिक आस्थामय ई पावनि शनैः-शनैः राष्ट्रियकरण होइत सम्प्रति अन्तरार्ष्ट्रिय भऽ गेल अछि आ पछिला समयमे पावनिक समस्त गुण विद्यमान रहितो महापर्व छठि उत्सवक स्वरूप सेहो धारण करैत जा रहल अछि।

छठिक विविध पक्षके महत्व

छठिक दू प्रमुख पक्ष होइत अछि- आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक। आध्यात्मिक पक्षक रूपमे छठिक लेल कएल जाएवला कठोर उपवास आ प्रसाद आदिक तैयारीमे अपनाओल जाएवला सात्विकता, शुद्धता एवं सावधानीकेँ लेल जा सकैत अछि

तँ सांस्कृतिक पक्षक रूपमे घाटक तैयारी, घाटमे पूजा-सामग्रीक व्यवस्थापन तथा सजावटि, सांस्कृतिक पहिरन-ओढ़नमे घाटपर लोकक उपस्थिति, सूर्यकेँ अर्घ्य देबाक विमुग्धकारी छटा, आस्थाक अतल गहिराइवला जलाशयक घाटमे हिलकोरैत नर-नारीक करमान आदिकेँ उपस्थित कऽ सकैत छी।

एकर अन्तर्यमे पाओल जाइत अछि सामाजिक एवं आर्थिक पक्ष सेहो। कतिपय कृषिजन्य उपजक खपतक दृष्टिएँ छठि बेस महत्त्वपूर्ण अवसर होइत अछि। ई पक्षसभ मेहीँ ढङ्गेँ विश्लेषण कएलापर मात्र अभरैत अछि। पछिला समयमे छठिमे थोड़-बहुत राजनीतिक पक्ष सेहो अभरऽ लागल अछि। यद्यपि हरेक पक्षमे छठि-परमेसरीक प्रति आस्था ओतबए सशक्त आ ओहिना जगजियार। छठि परमेसरी आ जनसामान्यक बीच कोनो पण्डित-पुजारी वा मध्यस्थकर्ता नहि रहैत अछि, व्रती स्वयं भक्त-भगवानक सम्बन्ध सेतु बनल करैत छथि।

दण्डवत प्रणाम करैत : छठिमे

दण्ड-प्रणाम करैत छठि-घाटधरि पहुँचबाक कबुला आ तदनुरूप कार्यप्रक्रिया, पूर्ण शूचिता आ आस्थाक सङ्ग सर्वथा मौलिक पाक– ठकुआ-भुसबासन प्रसादक तैयारी, धीयापुतासभमे अपार उत्साह आ जिज्ञासा रहितो पावनिक समाप्तिधरि प्रसाद आदिधरि पहुँचमे वर्जना ….. ईसभ मिथिलाक लोक महापर्व छठिएमे भेटि सकैत अछि।

नहाय-खाय, खरना, सँझुका अर्घ आ भोरका अर्घ– ई चारि विशेष उपक्रम होइत अछि चारि दिवसीय छठि पावनिक। कृत्रिम झिलमिल्लीसँ दूर गामक छठि सहज-स्वाभाविक प्राकृतिक क्रियाकलाप आ संसाधनसँ विशेष अर्गैनिक भेल करैत अछि। मुदा शहरक झिलमिल्ली आ रमन-चमन सेहो ओतबए आकर्षक रहल करैत छैक। असलमे कहल जाय तँ वाह्य पर्यटकसभकेँ आकर्षिक करऽवला मिथिलाक सभसँ कारगर एवं महत्त्वपूर्ण अवसर अछि छठिक क्रियाकलाप एवं मनोहारी छटा।

एक सङ्ग अनेक सकारात्मकता एवं संवेगकेँ सहेजिकऽ रखबाक परिपाटी छठिसँ बढ़िकऽ आन कोनो पावनि देखबामे नहि अबैत अछि। अइमे छठि परमेसरी निमित्त मात्र देखल जाइत छथि। छठि परमेसरीक नामपर लोककल्याण एवं आत्मोन्नतिक यावत क्रियाकलासभ लोक स्वयं करैत अछि। यथा पानिमे ठाढ़ भऽ छठि मनएबाक कारण जलस्रोत एवं जलाशयक उचित व्यवस्थापन तथा सफाइ हमसभ करैत छी जे आरोग्यदायक होइत अछि।

अपन खेत-पथार आ बारी-झारीमे उपजल धान-गहूमसँ लऽ केरा, कुसियार, भाटा, मूर, आदी, हरदी, टावनेबो सहित विविध खाद्यवस्तुक प्रयोग प्रसादक रूपमे कएल जाएब उत्पादनशीलता आ सन्तुलित आहारक दिशामे हमरासभकेँ उत्प्रेरित करैत अछि।

बाँसक बनल सूप, कोनियाँ, पनपथिया आदि सामग्री आ माटिक वर्तनसभ नव-नव प्रयोग कऽ अइ पेशापर आधारित जाति-समुदायक रोजगारी सुनिश्चित कएने रहबामे सेहो छठिक विशेष भूमिका रहैत अछि। सभसँ महत्त्वपूर्ण बात उगैत सूर्यक पूजा करबासँ पहिने डूबैत सूर्यक पूजा अछि। ई हमरासभकेँ सहज मानवीय सद्भाव एवं कर्त्तव्यक बोध करबैत अछि।

विभिन्न तरहक वनस्पतिसभक प्रचुर मात्रामे अनिवार्यताकेँ देखैत कहल जा सकैत अछि जे छठि पावनि वानस्पतिक विविधताक सरंक्षण आ पक्षपोषणमे सेहो महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कऽ रहल अछि।

एहन महिमाशाली छठि पावनि हमरासभक मिथिलामे लोकाचारक रूपमे प्रचलित अछि, जे मिथिलाक संस्कृतिमे रहल वैज्ञानिकता एवं मानवीयताक दिग्दर्शन करबैत अछि।

Dhirendra Premarshi

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