जलवायु परिवर्तनप्रति सचेत छठि पाबनिके वैज्ञानिक आ पर्यावरणीय महत्व
मानवद्वारा अनुग्रह भाव प्रदर्शित करैत आभार व्यक्त करबाक पाबनि छी छठि : धर्मेन्द्र झा

एहि वर्षक महापर्व छठि शुक्रदिन सम्पन्न भेल अछि । ‘नहाए–खाए’ सङे अइ सालक मङ्गलदिन ई पर्व सुरु भेल छल । बुधदिन साँझ खरनासङे परिवारक मुख्य महिला तथा अन्य श्रद्धालुसभ व्रतक सङे पूजा करबाक प्रण कएने रहैथ आ बृहस्पतिदिन सूर्यकेँ सन्ध्याकालीन तथा शुक्र क प्रातःकालीन अर्घ देल गेल रहए । तकरबाद पारनक सङ ई पर्व बिसर्जन कएल गेल ।
अइबेर मात्र नइँ सबबेर एहिना कएल जाइ छै । अइ अर्थमे कहबै त ई पाबनि चाइर दिनक छी । चाइर दिनधैर बहुत उत्साह तथा उमङ्गसँ ई पर्व मनाएल जाइ छै।
एखन किछ समयसँ छठि राष्ट्रिय मात्र नै, अन्तर्राष्ट्रिय स्तरपर मनाएल जाए लगलैए । हाल ई महापर्व विश्वमे जत कतौ मैथिली आ भोजपुरी भाषी छैथ, ओत मनाएल जाइ छै । मूलतः सूर्योपासनासँ सम्बन्धित ई पाबनि प्रकृति पूजनसँ सम्बद्धित अछि ।
ई पाबनिक माध्यमसँ प्रकृति जे जीवनदायिनी छियै, जीवन सञ्चालक छियै, प्रति आभार व्यक्त कएल जाइ छै। एतेक मात्र नइँ सूर्य, जकरा प्रत्यक्ष जाग्रत देवताक रुपमे स्वीकार कएल जाइत छनि, हुनक अनुपस्थितिमे अइ जगतकेँ सञ्चालन असम्भव अछि, हुनकाप्रति मानवद्वारा अनुग्रह भाव प्रदर्शित करैत आभार व्यक्त करबाक पाबनि छी छठि ।
सूर्यके उपासनाक सन्दर्भ त विश्वक बहुतेक देश आ बहुत संस्कृतिमे भेटैत अछि मुदा सूर्य पत्नी उषा आ सन्ध्या अर्थात् डुबैत आ उगैत दुनु सूर्यकेँ उपासना होबएबला सांस्कृतिक पाबनि सम्भवतः छठि मात्र छी । एहनमे सुन्दर भविष्यके अपेक्षासहित उगैत सूर्यकेँ शक्तिके उपासना मात्र नै, बरु विगतके शक्ति जकर कारणसँ ई सृष्टि आ सभ्यता अस्तित्वमे अछि, आजुक अवस्थाधैर आइब गेल अछि, तकरोप्रति अर्थात् डुबैत शक्तिप्रति अर्थात विगतके पुर्खाप्रति सेहो आदर सत्कारके भाव प्रकट करबाक पाबनि छी ई ।
ई पाबनिके केन्द्रीय पूजनीय तत्व सूर्य छी । सूर्यकेँ शक्ति मानल जाइ छै। अइ आधारमे ई पाबनि शक्तिके पाबनि सेहो छी । सूर्य ऊर्जाक केन्द्र छी । अहि उर्जासँ प्रकृति—सृष्टि सञ्चालित अछि । ऊर्जाके अनुपस्थितिमे जीवन सञ्चालन नइँ भ सकैत छै । अइ आधारमे सूर्यप्रति अनुग्रहित होबएबला पाबनिक रुपमे छठि पाबनिके महत्व अछि ।
सूक्ष्म ढङ्गसँ विश्लेषण कएल जाए त ई पाबनि वैज्ञानिक मान्यतापर आधारित रहल पाओल जा सकैत अछि । ई पाबनि मनेबाक प्रक्रियामे आ अपनाएल जाएबला विधिसभ विज्ञानसम्मत देखाइत अछि । आध्यात्म एहन पक्ष छी जे पराशक्तिप्रति सम्मान, समर्पण आ आस्थाके जोडैत अछि । श्रद्धा तथा विश्वासक नाममे कतौ ने कतौ भय आ त्रासक उपस्थिति रहै छै जे समाजमे बिबिध मान्यतासभ अपनेबाक लेल बाध्य करैत छै । छठि पाबनिके विश्लेषण कएल जाए त आध्यात्मक आवरणमे रहल भय आ त्राश विज्ञान आधारित स्थापित मान्यतासभके अनुशरण करबालेल समाजकेँ बाध्य बनौने अछि अथवा कहिक प्रेरित कएने अछि ।
एहने एकटा विज्ञान आधारित सन्दर्भ छी, डुबैत आ उगैत सूर्यके उपासना । विज्ञान प्रमाणित कएने अछि जे, सूर्यसँ उगैत आ डुबेत समयमे प्रसारित होबएबला किरण जीवनलेल बहुतेक उपयोगी अछि । ई किरणके अभावमे जीवन सभ्यताके निरन्तरता सम्भव नइँ अछि । छठि पाबनिकेँ एहन अनेक वैज्ञानिक अवधारणासँ जोइड़ सकैत छी । दोसर पक्ष अछि जल संरक्षण आ स्वच्छता । एखन विश्व जलवायु परिवर्तनक कारण सिर्जना भेल आ होबएबला सम्भावनाक असरसँ आक्रान्त अछि । जलवायु परिवर्तनक न्यूनीकरणके अनेक उपाय खोइज रहल अछि, वर्तमान विश्व । अइबारे विश्वकेँ सचेत बनेबाक उद्देश्यसँ बहित बेसी जनधनके लगानीमे वार्षिकरूपेँ विश्व सम्मेलन भेल करैत अछि। ई वर्ष सेहो छठिके लगले अजरवैजानके बाकुमे एहने सम्मेलनके आयोजना भ रहल अछि।
छठिक प्रवर्तकसभ मानव समाज आ सभ्यता बचेबाक लेल हजारौँ वर्ष पहिनेसँ (छठि पाबनि कहियासँ अस्तित्वमे आएल छै ? यकिन नइँ अछि) जलवायु परिवर्तनके सम्भाव्य अवस्था आ तकर असरबारे सचेतना देखएलैथ । जल आ जलाधारके संरक्षण करबाक आ प्रकृति बचेबाक वैज्ञानिक आवश्यकताबारे पूर्वज तहिये चिन्ता आ जागरूकता प्रकट केलैथ ।
ओसभ मानव सभ्यताक पक्षमे आध्यात्मिक आस्था तथा विश्वासकेँ माध्यमकरुपमे प्रयोग केलैथ । ई पाबनि कहियासँ मनेबाक क्रम शुरु भेल तकर यकिन एखनो नइँ भ सकल अछि । मुदा ई पाबनिके उपासना विधिके विश्लेषण करैत गेलापर ई निस्चित बुझाइत छै जे ई पाबनि मूलतः प्रकृति पूजनसँ सम्बन्धित अछि । ई पाबनि जलाशय, नदी, पोखैर, ताल तलैया लगायतक जलस्रोत क्षेत्रमे उपस्थित भ सूर्यके उपासना क मनाबैत छैथ । पाबनि मनेबाक क्रममे जलस्रोत आ सम्बन्धित क्षेत्रक शुद्धता आ सफाइमे विशेष ध्यान देल जाइत छै । ई शुद्धता आ सफाइक काज जल, जे जीवनदायिनी छी , तकर संरक्षणक लेल अत्यन्त जरूरी अछि ।
अइ पाबनिमे प्रसादक रूपमे अर्पण कएल जाएबला वस्तुसभ प्रकृतिमे आधारित रहैत अछि । केरा, उइख, गाछी सहितके हरदी आ तखन उपलब्ध अन्य कृषि—खाद्य सामग्री तकर उदाहरण अछि । अइसँ ई मानल जा सकैए जे छठि प्रकृतिके सम्मान करबाक पाठ सिखाबैत अछि । मूलतः नेपालक मध्य तथा पूर्वी तराई—मधेशमे उत्साह आ श्रद्धापूर्वक मनाएल जाएबला महापर्व छठि उगैत आ डुबैत सूर्यके उपासना क मनाएल जाइ छै । अइ पाबनिमे डुबैत सूर्य विगतके स्मरण करैत आत्ममूल्याङ्कन कएल जाइत छै त उगैत सूर्य सुन्दर आ स्वस्थ्य भविष्यके निर्माण करबालेल अभिप्रेरित करबाक विश्वास कएल जाइत अछि । ई पाबनि स्वास्थ्य, निरोगिता, सन्तानप्राप्ति आ परिवारक कल्याण तथा उन्नति आ रक्षाक लेल श्रद्धापूर्वक मनाएल जाइत अछि । निश्कर्षमे कहि त वैज्ञानिक दृष्टिसँ ई पाबनिके महत्वकेँ एना उल्लेख क सकैत छी ।
- ई पर्व शुद्धता आ स्वच्छताक महत्वपर जोर दैत अछि, जे स्वास्थ्य आ कल्याणक लेल आवश्यक अछि।
- ई पाबनि पर्यावरणके सन्तुलन आ संरक्षणके सन्देश सेहो देने अछि, जे प्राणीजगतके लेल आवश्यक अछि । प्रकृतिप्रति आदर भावके उद्देश्य पर्यावरणके संरक्षणक सन्दर्भमे जनचेतना जागृत करब अछि।
- प्रकृति सबके छी । ई सामूहिक सम्पदा छी । एकर उपयोग सब कियो करए सकैत छी आ कोनो आधारमे केकरो प्रकृतिके सदुपयोगसँ वञ्चित नइँ करबाक चाही,से सन्देश सेहो अइ पाबनिके छी ।
- जल, जीवन छी से महत्वपूर्ण सन्देश ई पाबनि देने अछि ।
- भोर आ साझँक सूर्यक किरण मानव स्वास्थ्यकलेल उपयुक्त होइत छै से सन्देश एहि पाबनिमे निहीत अछि ।
सूर्य आ प्रकृति जेना केकरोसँ भेदभाव नइँ करै छै । तहिना छठि पाबनि सेहो केकरोसङ भेदभाव नइँ करै छै । पूजा आ उपासनामे केकरो निषेध नइँ करै छै । छठि घाटमे मधेशी मात्र उपस्थित नइँ होइ छै । मात्र हिन्दू सेहो उपस्थित नइँ होइ छै । मात्र सम्पन्न आ धनिक सहभागी नइँ रहै छै । जाइतपाइतक आधारमे छुवाछूत नइँ देखाइत अछि। छठि पाबनिप्रतिके आस्थामे केकरोमे विभेद्के अनुभूति नइँ होइ छै । सब आत्मसम्मान आ प्रतिष्ठासहित जीवनयापन करऔक, छठि पाबनिके ईएह सन्देश निश्कर्षमे आएत —सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय ।
धर्मेन्द्र झा
(लेखक राससके कार्यकारी अध्यक्ष छैथ)




