Poem

5 टा मैथिली कविता : कवि रवीन्द्र मण्डल ”मञ्जय”

मैथिली भाषा विविधताके स्वर्ग अछि। जाहिमे अनेक रङ्ग देखबामे अबैत छै। एहि ठाम प्रस्तुत maithili language poems तेहने स्वर्गके एकटा रूपके दर्शण करबाओत । मैथिली कविता list अनुसार देल गेल छै। maithili poem के download अथवा Maithili Poem के Pdf बनाक Save सेहो क’ सकै छियै।

मैथिली कविता : हम तँ माँके कोखसँ जन्मल छी

अहाँ तँ पवित्र गंगाके निर्मल जल छी ।

हम तँ अशुद्ध कण गटरमे बहल छी ।।

 

अहाँ तँ लकड़ीमे सुगन्धित चन्दन छी ।

हम तँ बाँसक कर्चीके बरन छी ।।

 

अहाँ तँ पुष्पमे फूल कमल छी ।

हम तँ धुथुर बेरंग रंगल छी ।।

 

अहाँ तँ हिमालयसँ उपर पहुँचल छी ।

हम तँ पाताल जलथलमे लस्कल छी ।।

अहाँ तँ आकाशक चाँद चमकल छी ।

हम तँ बेसहारा एक तारा टुटल छी ।।

 

अहाँ तँ हीरा मोती रतन छी ।

हम तँ फुटल कौड़ी निर्धन छी ।।

 

अहाँ तँ ब्राम्हण क्षत्रीय कूल छी ।

हम तँ निच शूद्र अबल छी ।।

 

अहाँ तँ बड्ड सुन्दर गढल छी ।

हम तँ कुरुप सगरोसँ बनल छी ।

 

अहाँ तँ परी स्वर्गसँ उतरल छी ।

हम तँ माँके कोखसँ जन्मल छी ।।

Maithili Poem : जीवनके रंग

आँखि मुनले मs नइँ  खुलितो सपना सजाबैत अछि,

ओ सपनाके महल क्षणे मs तोड़ि गिराबैत अछि,

जब उहे सपना साँचक गला दबाबैत अछि,

जीवन ढंगसँ जियैत चली,  बेर–बेर सिखाबैत अछि ।।

 

समुन्दरमे उछाल देखियौ बहुत बेर आबैत अछि,

जखन अपन माथा चट्टानसँ टकराबैत अछि,

तब जा कए शान्त होएत पुनः स्थिरता अपनाबैत अछि,

जीवन ढंगसँ जियैत चली, बेर–बेर सिखाबैत अछि ।।

 

चान्दोकेँ देखियौ बादलमे अपन चेहरा छुपाबैत अछि,

पूनमके रातिमे ओ पुनः सैज–धैज कए आबैत अछि,

पन्ध्रह दिन अन्हरियाके पन्ध्रह ईजोड़िया कराबैत अछि,

जीवन ढंगसँ जियैत चली,  बेर–बेर सिखाबैत अछि ।।

 

भोरक भोरूकवाकेँ देखियौ होइत साँझ अस्ताबैत अछि,

जब दिन इजोत हुनके प्रतापे राति कतह बिलाबैत अछि,

नित भोर रोशन दिन पुनः उहे सूरज कराबैत अछि,

जीवन ढंगसँ जियैत चली,  बेर–बेर सिखाबैत अछि ।।

 

मधुर मौसम बसंत अछि तँ पतझड़ किए आबैत अछि,

खिलल मनमोहक ओ पुष्प फेर, किए मुरझाबैत अछि ?

गुलाबक कोमल–कोमल बदन पर काँट किय उगाबैत अछि,

जीवन ढंगसँ जियैत चली,  बेर–बेर सिखाबैत अछि ।।

हावाके झोका आबि कए एहि कात ओहि कात उड़ाबैत अछि,

बादल पहुँचियो कए आसमानमे नोर किय गिराबैत अछि,

कहैत अछि दुनिया गोल छै शायद तैं ई भरमाबैत अछि,

जीवन ढंगसँ जियैत चली,  बेर–बेर सिखाबैत अछि ।।

 

कखनो सुख तँ कखनो दुःख, एहिना हलचल मचाबैत अछि,

कखनो हँसाबैत ई जीनगी तँ कखनो ईहे कनाबैत अछि,

इहे रबैया जीवनके ईतँसदियौंसँ चैल आबैत अछि,

जीवन ढंगसँ जियैत चली,  बेर–बेर सिखाबैत अछि ।।

 

Maithili Poem : ईश्वरके रुपः माय–बाप

 

माँके ममतामयी अँचरासँ;

पीताके नेहपूर्ण बदरासँ;

प्रेम रुपी वर्षात भ’ गेल ।

तँ समैझ लिअ कि जीवन;

हमेशा आवाद भऽ गेल ।।

 

राम आजुक भगवान कहाबै;

मातु–पीताके बचन निभाय ।

परसुराम ब्रम्ह ऋषि कहाबै;

आज्ञाकारी धरम बचाय ।।

मातु–पीता जगदम्बा ब्रम्हा;

रमा – विष्णु भयो पालनकर्ता;

ई समैझ जौँ नित्य हुन्कर पूजा करु;

त समैझ लिअ कि ईश्वर के;

वरदान भऽ गेल ।।

 

श्रवण कुमारके कथा ब्यथा;

सभ क ई सिख दिलाय ।

नइँ अछि कोनो बडका धरम;

मातु–पीताके सेवा बाहेक।।

जिनगीक एहि मोड पर;

दुःखे दुःख सबठाम मचि गेल;

मातु–पीताके चरण सेवा करु;

त सम्झि लिअ कि जीवन में;

आराम भऽ गेल ।।

 

माय–बाप ऐहि धर्ती पर;

होए छथिन् ईश्वरके समान ।

दूनियाँ मऽ हुन्कासँ बैढ कऽ;

नै अछि कोनो ईश्वर महान ।।

समाजमे ऐहि तथ्यक जखन;

बड्ड निक उजागर भऽ गेल ।

 

त सम्झि लिअ कि संसार रुपी सिन्धु में;

राम सेतु कए स्थापन भऽ गेल ।।

 

Maithili Poem : जीत या हार

जीत कही कि हार कही ?

पूरा होइत छल, जे हम चाहैत छलहुँ ।

अपन अर्धव्याससँ बनाओल वृत्तके,

सीमा कहियो न नाङ्घैत छलहुँ ।।

 

सच्चाईके बाट खोजि–खोजि कए,

जीवन रथ सम्हारैएत छलहुँ ।

अर्जुनके तँ श्री कृष्ण छल सारथि,

हमर के ? हम तँ युद्ध हारैत गेलहुँ ।।

 

छाती पर हाथ राखि कए हम,

सिसैक–सिसैक कए कनैत छलहुँ ।

विवशताके अग्नि मs जरैत हृदय कए,

नोरक निर्मलतासँ बुझबैत छलहुँ ।।

मौसम मात्र बदलैत अछि एहि ठाँ,

समय रुपी गंगा मs छलाङ्ग लगबैत छलहुँ ।

जीवनके एक–एक पल गीन–गीन कए,

खुशहालीके आश मs कटवैत छलहुँ ।।

 

खुशीके मौसम फेर आएल नइँ  कहियो,

मरुभूमि मs छाहक लेल तरसैत छलहुँ ।

फाटल नइँ  धर्ती, गर्जल नइँ  आकाश,

नोर पीव–पीव कए जीबैत छलहुँ ।।

 

आशा सब निराशा भगेल त,

रुसल ईश्वर कए मनवैत छलहुँ ।

प्रार्थना करि ईश्वरसँ एकेटा,

शीघ्र अन्तिम घड़ी कए बोलवैत छलहुँ ।।

View Also: Devendra Mishra maithili poem

Maithili Poem : गाम बड्ड भोली

अहाँ छी माय बापक दुलारी,

हमहुँ जनै छी बड्ड सुकुमारी ।

तैं हम करलियै पहिने जोगाड;

नौकरी करलियै तैं सरकारी ।।

एक दिन लक’ आएब डोली;

लजाएब अहाँक गामक गल्ली ।

थाल माइटसँ खेलब होली;

लगाबिते बन्द भजाएत बोली ।।

गामक भन्सियाके सुआदे कुछ आऔर;

जीह कहत कनि और खाली ।

जखने खाएब साग तरकारी;

अपने बिसैरबए होटलके थारी ।।

 

नइँ अछि पार्क नइँ रेस्टुरेन्ट आ बार;

नइँ गाडी नइँ मोटर कार ।

चारू तरफ हरियाली हरियाली;

जब देखबै चैढ अहाँ बैल गाडी ।।

 View Also: Maithili Ghazal narayan Madhushala

जब अहाँ देखबै दशहरा दिपावाली;

गामके कि होइ खुशहाली ।

रङ्ग बिरङ्गी रङ्गोली होली;

तखन अहाँ कहबै गाम बड्ड भोली ।।

तखन अहाँ कहबै गाम बड्ड भोली …. 

रचनाकार 
कवि रविन्द्र  मण्डल ‘मञ्जय’
I Love Mithila – Stand for Maithili

Gajendra Gajur

गजेन्द्र गजुर जी एहि वेबसाइटक सम्पादक छथि। [email protected]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button