Poem

चन्द्रशेखर लाल ‘शेखर’ क पाँचटा मैथिली कविता

१. अहीँक नामपर: मैथिली कविता

नोरक सागर हेलैत एलौँ
खेपैत कहुना जामपर ।
सगर राति हम दीप जरेलौँ
अकसर अहीँक नामपर ।।

टुग्गर भेल निदरदीक बस्ती
एखनोधरि असिआएल छी ।
थाहैत टीसक दाह मनोरम
वयस गुमा भसिआएल छी ।
घाट–बाट हम पिछड़ैत एलौँ
यादक चिक्कन चामपर।।

रीतल सुराक भभकैत वासन,
सन जेना बसिआएल हम ।
बिना प्रयोजन ऐँठ कटारमे
युग-युगसँ ओँघड़ाएल हम ।
ढौह गनैत छी दर्दक सागर
भेल चकित अञ्जामपर ।।

बड़ नोछार सहेजने युगकेर
बेमन पथ टौआइत एलौँ ।
पोर–पोरमे पीड़ा कसने
भेल बेघर खौँझाइत एलौँ ।
निष्ठुर पलक गुजारक हेतुएँ
लागल कहुना लामपर ।।

मलिन सोह, स्मृति मधुएलहा
बरबस मन जे गेल समा ।
अनचोक्के इन्द्रेणीसन जे
नित्तो सपना जाइत छता ।
ढोबैत एलौँ महल विश्वासक
लोभे जेना इनामपर ।।

मृगतृष्णाक मयावी कुदरति
रहल पलाइत अभोग जेना।
महा अतृप्तिक अभेद्य दुर्गमे
गोँतल सदा सुयोग जेना।
बिन दरशन–परशनके रहलौँ
खूटल सदा कुठामपर।।

२. दरद ने कोइ पतिआइए रे: मैथिली कविता

जिनकर चर्चा अगजग केलौँ
सुमिरन गीत, कवित रसेलौँ।
हुनके पता एखनधरि लगबैत
निशिदिन नयन नोराइए रे।
दरद ने कोइ पतिआइए रे।।

अनुपम रागक ऊर्जा पावन
पन्हुगेलक जे उर आकर्षण।
केलक विरोगक वीजारोपण
जग प्रवेश केलौँ नव स्वादन।
उएह स्वादनके निर्मल रसना
जग उड़िएने जाइए रे।
दरद ने कोइ पतिआइए रे।।

जे तृष्णाके दाह दहेलक
अजब सुआसक साह भसेलक।
सोह–मोहके धाह रसेलक
अधरम–धरमक नाह भसेलक।
उएह नाहके मनहर खेबन
नित मोन मड़राइए रे।
दरद ने कोइ पतिआइए रे।।

सुखम–दुखम जीवन धाङैत
आश–निराशक पाँतर नाँघैत।
झूठ–साँचकेर पतड़ा बाँचैत
संयम–विद्रोहक चिनगी टाँकैत।
उएह चिनगीके अपरुव ज्योति
आब नयन गरिआइए रे।
दरद ने कोइ पतिआइए रे।।

मानस शून्य जखमके डेरा
टीस कसकके शत–शत फेरा।
छान्ह–बान्हके कसगर घेरा
आइर–धूरके फान घनेड़ा।
उएह फानक उठेलहा जोखिम
जग बिसरल ने जाइए रे।
दरद ने कोइ पतिआइए रे।।

करमैते लेल जन्तर–मन्तर
कबुला–पाती टोना–टापर।
हम्मर उरके दाह निरन्तर
छपने धरा समेटने अम्बर।
उएह निस्सीमके कसगर घेरा
आब समेटने जाइए रे।
दरद ने कोइ पतिआइए रे।।

३. धरती: मैथिली कविता

छल धरती अप्पन सोनासन।
रे टटका फूलक दोनासन।।

ओजश्वी पर्वत, यशस्वी मधेश,
मनहर भाषा, सबटा भेष।
जेना हीरा–मोतीक खजानासन।
छल धरती अप्पन सोनासन।।

काया सोहनगर, अजेय सिमान,
दप–दप दिनकर, मह–मह चान।
सम्मोहक सरस ओछौनासन।
छल धरती अप्पन सोनासन।।

सात समुन्दरक, शिर सिन्दूर,
अक्षय यौवन, कस परिपूर।
नित पावन ऊर्जाक दहौनासन।
छल धरती अप्पन सोनासन।।

उछतगर नदी, अगम जल–ताल
छलै उच्च मनोबल, बजरक ढाल।
मनमोहनी शक्ल लुभौनासन।
छल धरती अप्पन सोनासन।।

राजमुकुटके, डुबल सिनेह,
सीता–बुद्धक, पावन गेह।
जेना अलौकिक कोनो खेलौनासन।
छल धरती अप्पन सोनासन।।

भेल एकाएक, आइ घबाह,
अम्बर–धरा, घिनाएल दगाह।
भेल सुख–समृद्धिक भगौनासन।
छल धरती अप्पन सोनासन।।

बम, बारुदके, धुआँ पताएल,
लेहूक धार, दहैत सोगाएल।
जग कहबैत धरम गमौनासन।
छल धरती अप्पन सोनासन।।

४. बिसरि ने सकबै हे भगवान: मैथिली कविता

पछिम जनकपुर, पुरुब धरान,
बीचमे रमकैत, सुरमा लहान।
बलानक बाढ़ि, खुटिक कटान,
केना बिसरबै, हे भगवान।।

दक्खिन समतल, उतर पहाड़,
कमला–कोशीक, पैघ पसार।
फलफूल हिमालक, तराइक धान,
केना बिसरबै, हे भगवान।।

सटले पकरिया, भिड़ल फुलबारि,
जतबे मानिक दह, ततबे पतारि।
कवि विद्यापतिके, बनौली स्थान,
केना बिसरबै, हे भगवान।।

सोम–शुक्रके, बड़का हाट,
खाइते पीबिते, बटुआ टाट।
मुरही–कचरीक, बड़का टान,
केना बिसरबै, हे भगवान।।

दहा–गुढीके, पावन प्राङ्गण,
गीत–नादके, उर्वर आङ्गन।
रूपा–धीरेन्द्रक, मैथिलीक गान,
केना बिसरबै, हे भगवान।।

५. सबटा दाग देखार: मैथिली कविता

आङन-घरक सिनेहिया महिते,
चुम्मा चाटीक दरदिया सैँतिते।
गूँड़ खुआ पचनियाँ पाचिते,
गोआ पानक जोग चिबैबिते।
केदली वन, कचनार सिसोहिते,
नगर मचल हहकार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

मादक वयस लैते पद्मासन,
दहिते मोह सम्मोहक भासन।
दरश परसके स्नेहिल चासन,
चोन्हरेलक जग नव आकर्षण।
स्वप्निल नेहक पावन ऊर्जा,
रसबैत गेल फुहार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

भींड़, बसबाइर, परतीके नाँघन,
भगवा, घघरीक अपरूव फुदकन।
हाफ पैन्टके नवका प्रदर्शन,
अंगरेजियाके धाकक प्रेषण।
हास–परिहासक अभिनव लीला,
मोहलक मोन रतनार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

कमला पोखरिक, सरस आचमन,
बहकन, थिरकन केलि निर्बसन।
पुरनी पोखरिक मखानक सोहरण,
सरस गीतके मनहर गायन।
उएह परतीक अनमोल पिरितिया,
पिघलैत नोरक टघार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

हटबैंत घोघ, चानके दरशन,
टिकुली-नथियाक चित्ताकर्षण।
दाड़िम-अनारक कुसमय खोँटन,
रीति बेरीतिक अनुनय ज्ञापन।
बेली जूहीके पावन सौरभ,
गोरलक महा मलार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

हएत फुलबारी ओहिना मजरल,
वर-पीपर सब ओहिना चतरल।
उएह डिहवार सलहेसक गहबर,
चान सुरूज हैत ओहिना ओंघरल।
बैर, धात्रिक सब बाट जोहैत हैत,
झटहा खेने हजार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

दोग, सोन्हिके मौज मनेलहा,
झाँट-बिहारिक लिलोह कमेलहा।
रंग-रभस अनुराग रमेलहा,
सुरभित साँस अगाध जुरेलहा।
अनुपम सौखक मादक सपना,
एखनो कुचरैत चार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

महमहाइत सब केलहा–धेलहा,
रमन–चमनके समय गमेलहा।
ताल-बेतालक खेल लगेलहा,
सुपत-कुपतके नाह भसिएलहा।
भुलकाबैत उएह बोहक अर्पण,
होंकरैत बीच बजार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।
सुमिरैत एखनो, स्वाँस बरैए,
सीमा-साँध ठोर दगैए।
आतम दगध महा कलपैए,
अनचोके सदा पलक रसबैए।
घनानन्दक सन्तति बनवासी,
भोगैत अभोग भोगार रे मितवा,
सबटा दाग देखार।।

© लेखक : चन्द्रशेखर लाल ‘शेखर’

■ जन्मतिथि : वि. सं. १९९०, माघ
■ शिक्षा : हिन्दू युनिभर्सिटीसँ मैट्रिक
■ कविता-कृति :
● हम नेपाली हम नेपाल
● गिरिजाबाबू जय नेपाल
● शूलीपर सन्त
● मंगलध्वनी
● सबटा दाग देखार
■ गीत-कृति : ‘उठ मङ्गला जोर कर’ आ ‘खाली झोरी..’ ( सङ्गीत : धीरेन्द्र प्रेमर्षि )

‘सबटा दागर देखार’ पर ‘मुख्य आकर्षण’ विचार :-

एहि सङ्कलनक सभ कविता कविक जीवनक भोघल यतार्थ अछि। अपन जीवनमे ओ जाहि परिस्थितिसभसँ साक्षात्कार कएलनि अछि, ओहि समस्त यतार्थक अनभूति कवितासभक पाँती-पाँतीमे उपस्थिति अछि। समस्त स्थिति हुनक हृदयपर आघात कएलकनि आ ओही अनुभूतिसँ अन्तर्भावनाक स्वर प्रस्फुटित भेल अछि। – रमानन्द रेणु

पथार लागल गमैआ पुर्खाक सिरजल शब्दसभ। ‘शेखर’ जीक कविता कम शब्दमे बहुत किछु कहैत अछि। मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ हुनक लेखनी निरन्तर किछु ने किछु अवदान कऽ समृद्ध करैत रहत तकर आशा करैत छी। – रामभरोष कापड़ि ‘भ्रमर’

मैथिलीक सामाकालीन कविताकेँ देखैत आदरणीय कवि ‘शेखर’क कविता हमरा ने उत्कृष्ट लगैत अछि, ने निकृष्ट लगैत अछि छि आ ने साधारण बुझाइत अछि। मुदा प्रत्येक कवितामे कतहुँ ने कतहुँ एकटा एहन कोनो तत्व रहैत छैक जे अनचोक्कहिँ मोनकेँ छू लैत अछि आ सौँसा शरीरमे एकटा झनझन्नक दौड़ा दैत छैक। – धीरेन्द्र प्रेमर्षि

□ कविताक श्रोत आ विशेष आभार : धीरेन्द्र प्रेमर्षि

Vidyanand Bedardi

विद्यानन्द वेदर्दी जी एहि वेबसाइटके सम्पादक छथि। Email - [email protected]

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