अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मैथिलीमे रचित छ’टा रचनाकारक रचना प्रस्तुत अछि ।

6६. गजल: त अहीँ कहु कोना क’ बेचारी छी ?

रचनाकार: खुश्बू मैथिल

जब माइ-बाबूके बेटी दुलारी छी हम
त अहीँ कहु कोना क’ बेचारी छी हम

भैयाक’ रक्षाकवच “राखी” हमरे हाथ
श्री कृष्णक हाथ सँ’ बढ़ैत सारी छी हम

शारदा दुर्गा माता लक्ष्मी काली सीता
कतौ द्रौपदी तँ कतौ गान्धारी छी हम

अयोध्या लेल किएक नै खराब भेली
मुदा मिथिलाक बेटी संस्कारी छी हम

बढ़ली गिरली उठली फेर सँ’ चलली
तेँ न आइ कर्मचारी सरकारी छी हम !

5५. गजल: हम नइँ कुलक कलंक छी !

दिनेश यादव

माइ हम तँ अहेक अंग छी
हम नइँ कुलक कलंक छी

बेटाक आशमे, बेटी मारैय
युगोसँ बनि अग्नी तरङ्ग छी

स्त्रीजनकेँ देवी बेटी कहैय
गर्भोमे लड़ैत हम जंग छी

सरो-समाज निर्दय बनल
एकर व्यबहारसँ तंग छी

जे देखैय दुटा उलहने दैय
जेना हम कोनो मृदंग छी

शोणित देहसँ ऐना बहैय कि
लगैय होरीमे उड़ल रंग छी

4४. कविता: मजूरिन

मनिश झा बौआ भाइ

सुनह!
तोहर भाग्योदय कोनो मनुक्खक हाथ नहि
तोरा अपनहि हाथक रेघामे दकचल छह

नहि खटबह तँ पेट कोना भरतह
माँटि कोड़ि खेबह सेहो सामर्थ्य कहाँ देने छथुन भगवान
जकरा तोरा आउर पँचबर्खा विधाता बुझलह
से फेर सँ किछु फुसिये गछि गेलह
जे गछैत रहल छह
तोहर सासु-ससुर आ स्वामीकेँ

तोरो चाउर-गहूम आ मटिया तेलसँ बेसी बेगरते कोन छह?
अपन मजूरीक जोगाएल रुपैँयसँ
दुर्गापूजा आ ईँदमे नबका लत्ता पहिरबाक सौख सेहो पूरा भइए’ जाइत हेतह

तोहर मजूरी करब आब नहि अखरैत अछि
आ ने द्रवित होइत अछि हृदय, तोहर माँथ पर गेटल पजेबा देखि

अभिमान होइत अछि तोहर ओहि स्त्रीत्व पर
जे गिद्ध सँ मासु नोचेबाक दोकान सँ अनभिज्ञ
स्वाभिमानक पसेना सँ सानल
बालु-गिट्टी-सीमेंट मिश्रित मसल्लाक तगाड़ नेने
महलक-महल चढ़ि जाइछ ओएह सीढ़ी
जे सीढ़ी कहियो आपातक स्थिति मात्रमे प्रयोग हेतैक
अन्यथा लिफ्ट भ’ जेतैक विकलांग

बोल-भरोस देनिहार सेहो बेसी तेहने भेटतह
जे अपनहि अखादारुण पेट भरबा लए ततेक रहैछ अपसियांत
जे बिर्त रहैत छह तोहर घेंट कटबा लए,पेट कटबा लए

ठिकेदारक हवसी आँखि होइक वा मुंशीक बैमान नेत
प्रतिकार करैत तोहर आत्मबल सहजहि करैत अछि आश्वस्त
जे कोरामे स्तनपान करैत तोहर बुचिया
देखतै जरूरे समय सँ इसकूल-कॉलेजक मुँह
आ तोड़ि देतैक मान्यताक ओ ताला
जे टाँगल छैक कएक जुग सँ भाग्यक चौखटि पर

3३. गीत : दैबा हो बेटी किए तोँ बनेलह’

अक्षय आनन्द सन्नी

नोर नहि आँखिमे शोणिते देलह’
दैबा हो बेटी किए तोँ बनेलह’

अकथाइन जिनगी, ऐनमेन बाकस
मरल मोन नियति करै उकस-पाकस
सौख – सेहन्ताक मानि कोनो ने
नोछरै छै, भोम्हरै छै डेगे-डेग राकस
पाथर करेज करब किए ने सीखेलह’
दैबा हो बेटी…

नेहक वितान नै रहलै खुशफैल हो
नेंत लगैए जगकेर भेल मटिमैल हो
गिद्ध पतीत ई समय जखन छै
बेटिए तखन किए छुतहा घैल हो
कालक एना किए चकरी घुमेलह’
दैबा हो बेटी…

धिया लेल रचलह केहन अनुराग तोँ
प्राणेटा देलहक, देलह नै भाग तोँ
जाधरि सिया हमर हुकरैत रहतीह
सुनैत रह’ दैबा हो, ई उपराग तोँ
मान-सम्मानक तोंही बाँटी लगेलह’
दैबा हो बेटी…

2२ कविता: “नारी उत्थान”

रचनाकार: विजय दत्त मणी

हे सीया! दिअ एक धीया
जे वसुधा पर राज करय।
शोषित पिडित दमित नारीके
नवउत्थानक काज करय।।
नइँ भ्रुणमे मारल जाए,
नइँ खधियामे गारल जाए।
नारीके असह्य दशाके,
नारी मिल सुधारल जाए।।
नारीक अत्याचार विरूद्ध
डटिक जे आवाज करए।

बदलि सकए जे लोक धारणा
सासुरके असिम तारणा
तोडि सकए सब अनुचित बन्हन
लिङ्ग विभेदक मिटए भावना
भय रहित होबे नारी,
नारी नारीपर नाज करए।

आब नै नारी दाम बिकए,
सबके करमे काम भेटए।
चढए फानिकऽ उँच्च शिखरपर
अमिट अमर एक नाम भेटए।।
पढ़ए गुनए आ होए सिर्जनशिल
चन्द्र चढए नहि लाज करए।

नइँ नारीके दान होए आब,
नारीके सम्मान होए आब।
सृष्टीक मूल जगत जननीके,
एक अलग पहिचान होए आब।।
अपन सुकर्मक फलस्वरुप
नारीके शिरपर ताज परए।

नहि नारी आब अबल बनए,
अपना दमपर सबल बनए।
अपने हाथे सिचे सदिखन
जीवन बगिया नवल बनय।।
“मणि”क आलोके आलोकित हो,
जीवन आ जग साज करए।

1१. कविता: चेतना

रचनाकार: करूणा झा

रोज पढ़ै छी
रोज सुनै छी
भोर – साँझ
हम डरे मरै छी
नारी हेबाक
दंड भोगै छी
केहन देश ई ?
केहन समाज ?
जकरा नइँ भय
नइँ छै लाज
नारीहंता पुरुष प्रवृत्ति
नारी विद्वेषीसभ काज
मनुवादके पूजक जनता
मनुस्मृतिमे एहन समाज ?
मातृपूजक मातृशोषक
हीनभावनाके सब पोषक
नित्य बलत्कृत, पीड़ित नारी
नित्य घटइत घटना प्रतिशोधक
लाज लगैय नारी बनिक
कियैक जनमलहुं देवभूमिमे
कियैक जनम दऽ पुरुष पात्रकेँ
जीबि रहल छी बद्धभूमिमे
प्रतिहिंसा, प्रत्युत्तर छै की
एहि समाजमे पुरुष वर्ग लेल
काटि दी सबके आरी बनिक
अविवेकी, अत्याचारीसभकेँ

international women’s Day
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मैथिली कविता।
Women’s day poem

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