इतिहासमे नाम केकर लिखाबै छै ? : युवा सक्षमता दिवस, i love mithila ,Maithili Ghazal ,,Gajendra gajur

प्रस्तुत अछि पाँचटा गजल…

मैथिली गजल १

उतर दक्षिणसँ सांठगाँठ करै छै आब गोनु बाबू,
बुढारीमे घोडी चढबाक आँट करै छै आब गोनु बाबु

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नोकर छथि देशके से भुइल गेल छै आब ओ
अपने बपौटी समुच्चा राष्ट करै छै आब गोनु बाबू

ओकर बात जेना उड़ैत कौवाके पिठी पर जत्ता
सभहक पिछवाडामे समाट करै छै आब गोनु बाबू

ओ बड़ माहीर छै हमरा अहाँक’ बीच लड़ाबमे
गोर आ कारी खुब काटछाँट करै छै आब गोनु बाबू

“सम्भव” सम्हैर गेल अछि आब अहूँ बिचार करु
सत्ताके आयुलेल खुब पुजा पाठ करै छै आब गोनु बाबू

मैथिली गजल २

अहाँ मात्र एकटा काम करु
हमरा अहाँ अपन नाम करु

सब देखाबा अछि रिति रिवाज
छोरु जुनि कोनो तामझाम करु

मोनक मन्दिरमे बसल छै देवता
भले यात्रा अहाँ चारु धाम करु

लोकक’ सोच अछि सोचऽ दियौ
चलू छोरू दुनियाँके राम राम करू

प्रीतक शीतसँ जँ सिमसीमायल छी
हमर करेजामे सटिक’ अराम करु

मैथिली गजल ३

जागुजागु आँखि खोलि देखु चोरबा घरमे घुइस रहल य’
भाइ भाइ छी भाऽनस फुटौने पड़ोसी मुहँ दुइस रहल य’

कान पऽ ढेला धऽ बैसल छी, घोड़ा बेचक’ जेना सुतल छी
नश्लवादी शाेणितके पियासा अहाँक खुन चुइस रहल य’

नङ्टे अहाँक’ नाच नचबैय’ घरे घर ओ बास करैयऽ
अहिँक पुरखाक’ अरजल धोति दोसर कियाे धुइस रहल य’

गूँड खिया’क चिनी लुटैय अहाँक आँखिमे धुल झोकैयऽ
आब नहि बाजब त कहियो नपाएब बुज मुहँमे ठुसि रहल य’

गद्दा छोड़ु कुछ अलग सोचु ब्रम्हास्त्र केरऽ बात करु
लगाउ निसाना अर्जुने जकाँ बेर बेर मौका हुँसि रहल य’

पुर्ब सऽ पश्चिम धधकैय, मैथिल सभ अधहन सन खधकैय
कहै “सम्भव” मिथिलामे देखु जानकी मैयाँ रुइस रहल य’

मैथिली गजल ४

सच्चा नजरसँ झौपड़ी आ दरबार देखु बराबर लागत
मोन अलग मुदा दिलके आकार देखु बराबर लागत

सभ चरीत्र भ्रष्ट अछि एतय निज स्वार्थमे डूबल
निचा जनता उपर सरकार देखु बराबर लागत

अहाँ किनका सभ्य किनका असभ्य कहबै एतय
किनको कलम किनको तरुवार देखु बराबर लागत

कहाबत अछि कमाइ मात्र छै रिन्च आ सिरिन्चमे
मुदा अहाँ राजनीति आ व्यपार देखु बराबर लागत

धर्मके खोलमे सैतान सभ बाबा बनि छुपल छैक
नेताक’ नारा आ बाबाक’ जयकार देखु बराबर लागत

मैथिली गजल ५

 नेता करिरहल छै रसेरसे
लोक मरिरहल छै रसेरसे

सहरिकरणके भुत चढ़ल अछि
गाम उजिरहल छै रसेरसे

लोकतन्त्रक’ भेड़ा फुजल अछि
देश चरिरहल छै रसेरसे

नहरक’ फाटक खसले अछि
धान जरिरहल छै रसेरसे

संसद भवनमे धुवाँ उठलै
आगि बरिरहल छै रसेरसे

धधकतै होम लपकतै ज्वाला
घिउ परिरहल छै रसेरसे

ओ जे रोपने छेलै बृक्ष द्वेषके
घृणा फरिरहल छै रसेरसे

 

गजलकार

मैथिली गजल

रामअधिन सम्भव कल्याणपुर न.पा. डड़ौल-४ सिरहा, नेपाल
हाल: दोहा, कतार

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