Story

एकटा विनु बियाहल बापक कथा


 

”विनु बियाहल बाप” 


छुरासन ठार नाक,उज्जर धबधब गोलेमोले मुंह,पतरे देह आ पांच हाथके नमगर मरद।देख’ मे एकदम अक्षय कुमार सनके।बाहरसँ देखिक कियो नइँ कहि सकत एकर कोनो कमजोरी।ओना कमजोरीयो तेहन नइँ।एखुन बाँचले के छैक एहि सबसँ?? मुदा तैयो अतेक बेसी ???? ओह! हदसँ ज्यादा….

रोज रोज सिगनेचरके बोतल,

 लोकल मुर्गा,छौड़ासबहक संग गप्प छरक्का मारब एकर नित करम।फेसबूकमे फ्रैन्ड सर्च,रिक्वेष्ट पठेनाइ आ तुरन्त इमो नम्बर ल’ अडियो-भिडियो कलमे व्यस्त.. एकर दिनचर्या।बात बात मे ट्वीष्ट आ भवाक द’ हसनाइ एकर मोहिनी मन्तर … साइन्सके एकदम परफेक्ट आ योग्यतासिद्ध शिक्षक मुदा सेग्मन्ड फ्राइडके यौन मनोविज्ञान सँ बेस प्रभावित।कोन छौडी/मौगीके केना पटाएल जाए आ कोना एकर कथा चर्मोत्कर्स तक पहुँचल जाए ताहिमे एकदमसँ सिद्धस्त।हरेक दिन नव ब्रान्डके दारु आ नव लडकी संग रंगरभस एकर जिनगीक महत्वपूर्ण हिस्सा।सायद इएह कारणसब रहैक जे हप्ता/दू हप्तासँ बेसी कोनो घरपट्टी संगे नइँ जमैक आ
झट्ट द’ अपर्झटेमे रूम खाली कर’ पडैक। इएह कारणो छैक जे बितल १५ महिनामे १५ टासँ बेसी रूम खाली क’ चुकलै मुदा सुधार रत्तिभरि नइँ अपनामे …..

ई ओकर रूम खालीक…

बीसम घर। तीन तल्ला बिल्डिङ,आगुमे अलि-फलि जमिन,चारुकात फुलगुल लागल बगैँचा। घरपट्टी अपने तीन तल्ला पर रहलाक कारणे बाँकी तल्लासबमे विद्यार्थी वा बैचलर आ परिवारिक सबहक लेल सहजे रूम भेट जएबाक सुविधा।एहि रुपे आलोकके भेटल रहैक ई रू।रूम पाबि बहुत प्रसन्न भेल रहए आलोक।अपने आपसँ बचनवद्धता कैलक जे आब ई रूम चेन्ज नइँ करब।अपने सँ कागज पर एकटा आचार संहिताक तालिका सेहो बनाओल।

१.दारु कम पियब।मुदा छौडासबहक संग नइँ अस्गरे।

२.बेसी लोकके नइँ लाएब।अबेर रातिधरि नइँ जागब।

३.दारु पी क हो हल्ला नइँ करब।घरपट्टीके नइँ धमकियाएब।

४.छौडी/मौगीके रूममे नइँ लाएब।सकभर प्रेमालापो सँ दूरे रहब।

५.एहिबेर MSC मे एडमिसन कराएब । नीकसँ पढब आ विद्यार्थीयो सबके नीकसँ पढाएब।

अचार संघियता  पर मोस्किलसँ २ दिन बितलै होएत जिनगी। श्वास फुल’ लगलै। धडकन सेहो बढलै। मोनमे कछमच्छी आ छटपट्टी दुनू एक्केबेर धेलकै। मस्तिष्क काज नइँ कर’ लगलै कहाँदन।-ओकरे कहनाम। अन्तमे हारल थाकल अलोकबा रूम बन्द केलक।सिगनेचर नइँ भेटलै।दालबुट आ चुरा संगे भोडका के पैक खिचलकै।रूम बन्दे रहैक।दोसर कोनो मितो नइँ रहैक।जे जेना.. कने राहत भेटलै।बिन्दास सूतल ओहिदिन।दिन अहिना बितैत गेलै।कहियो शोखसँ त कहियो बाध्यतामे,कहियो अस्गरे त कहियो मीतासबहक संग फेर पिबैत गेलै।धीरे धीरे अपनेसँ बनाओल नियम/कानुन एक एक क’ टुटैत गेलै।तथापी हारि नइँ मानने रहैक अलोकबा।ओना किछुओ करैक त पहिनेसँ बहुत सावधान,बहुत सजग।

हप्ता दिन बितलै…

उपराग कोनो नइँ एलै।  सायद सुधारात्मक जिनगी जिबि रहल छलै ओ।अहिना लगलै ओकरा।कने प्रसन्न बुझाइत छलै ओ।दिन अहिना बितैत गेलै।बाप रे! एक महिना काटिक’ दोसर महिना चढलै। घरपट्टी दिस सँ कोनो कम्पलेन नइँ एलै।रूम सेहो खाली नइँ कर’ पडलै।आलोक अपनाके भाग्यमानी सम्झलक।ओ महिना दिन केर अपन डाटा देखलक। सबकिछु ओहने मुदा बहुते नियन्त्रणयुक्त।मोन प्रसन्न भेलै।फोनफान/डेटिङ/सेटिङ सेहो पहिनेसँ बहुते न्युण।अपना आपके गौर्वान्वित महशुस केलकै।

बात तेसर महिनाक उतरार्धके छैक। शनि दिन।स्कूलमे छुट्टी रहैक।एहि बीचमे ओ अपनाके ततेक बेसी ने नियन्त्रणमे लागिगेल रहैक जे चारुदिस सँ उपराग आब” लागल रहैक।ने संगमे पिनाइ आ नहिए साथमे फिल्म देखनाइ।ई कि भ’ रहल छै?? किए अतेक बदलि गेले भाइ?? छौडासब बारम्बार टोकारी मार’ लागल रहैक।टालैत/टालैत एक दिन समय मिलेलकै।ताँहि योजना बमोजिम अमीर खान के फिरङी देखि आएल रहे।रूममे अबितेधरि एकटा पत्र हाथ लगलै।खिडकीमे घुसियाएल रहैक।

पत्रमे लिखल रहैक- Hi… नीके होएब से आस संग मोनमे हजारो आस ल’ ई पत्र लिखि रहल छी। बात कोनठाँसँ शुरु कएल जाए से त नइँ पता.. मुदा तैयो दुस्साहस करैत छी अपन बात कहबाक।मोनसँ मोनके मिलेबाक।ओइ दिन हमर तबियत खराब भऽ गेलाक कारणेँ जे अहाँ होस्पिटल ल’ जा उपकार केलहुँ ।ताहि लेल आभारी छी।रातिभरि हमरा लेल होस्पिटलमे जगलहुँ , से हमरा अहाँ प्रतिक प्रेम जगा दएलक अछि।घरपट्टी अन्टीसँ सेहो बेर बेर अहाँक बडाइ सुनि मोन प्रसन्न भऽ जाइअ।अतेक सुन्दर,सुशील आ सहयोगी पाबि हम अपनाके धन्य बुझैत छियैक।ओना भेटिक धन्यवाद देबाक चाही मुदा अतेक तें हिम्मत नइँ जुटा पेलहुँ।तें एहि पत्रके सहायता ल’ अपन मोनक बात कहबाक साहस क’ रहल छी।हमर नैन आब अहींके बस देखैए।मोन हमर अहीँके तकैए।हम त अहाँसँ बसे प्रेम करैत छी।कि स्वीकार अछि अहाँके हम्मर प्रेम??अहाँक प्रेमके पुजारी- उपरका तल्लाबाली   –   शिवानी…

आलोकके आँखिमे एलै.. ओ भयानक राति।सीढ़ीपरसँ उतरैत काल खसिक चोट लागल शिवानी आ घरपटीक कहबसँ घरपट्टीए के मोटरसाइकल पर होस्पिटल ल’ गेल शिवानीक स्थिती।ओ अब्बाक भ’ गेल।मस्तिष्क जेना काज नइँ कर’ लागल हुवे।

तत्काल किछु सोचिए नइँ सकल आलोक।

शिवानी भर्खरेक विवाहित महिला। घरबला विदेश गेलाक कारणे आ साउस-ससुरसँ नइँ जमलाक कारणे भडेमे रहैत छैक। पिरसियाम रङ,हसमुख चेहरा,शूट सलबारमे खूब नीक,पतरे गरहनि,पतरे कम्मर,पानसन,पातर ठोरमे गुलाबी लिपिष्टिक,अते के नाक,सचमुच बलिउडके काजल लगैक।ओना ओकरा देखि आलोकके मोनमे हजारो लअड्डु नइँ फुटल रहैक सेहो नइँ अपना पर बहुत बेसी नियन्त्रण करब सीख लेने रहए ओ।मोन बेपीडित भऽ गेलै।माथा काज नइँ केलकै तत्काल।किछु उचित निर्णये नइँ एलै दिमाक सँ।भीतर छटपटाहट बढ लगलै।अन्तमे बैगसँ भोडकाके बोतल निकालि खिचि देलकै दू पैक आ सुति रहलै चैनके निन्न।भोर भेलै।नहा-खा सकूल गेल।मोन पत्रसँ नइँ हटलै मुदा अन्तमे मोन के सम्झौलक।ई गलत छैक।एना नइँ हएबाक चाहिँ।आलोक एक हप्ताधरि ने उपर दिस गेल नहिए रूमसँ ज्यादातर बाहर निकलल।एम्हर एकटा भोडका सठि दोसर सिगनेचर आ तेसर नोपोलियनमे सेहो हाथ लागि गेल रहैक।

शुक्र दिन।सबकियो व्यस्त।आलोकके देह बोखार सँ धहधह जरै।बाहरमे ट्वाइलेट गेल।ओतै खसि पडल।संजोगसँ घरपट्टीके बेटी दएखलकै।चिचियेलै।

हौ बाउ आलोक अंकल खसि पडलै।केना भेलै?? गै माइ दौगही न।हौ के सब छा? दौ ग न…

आवाज शिवानीयोके कानमे पडलै।हहाइले-बफाइले नीचा उतरलै।पजियाक रूममे ल’ गेलै।पानिक पट्टी केलकै।लसुन-तेल पका भरि देह खूब नीक सँ मसाज केलकै।पिंकी(घरपट्टीक बेटी) हाथे टेब्लेट मंगेलकै।खुवा सउतादेलकै।आलोक के मोन तृप्त आ आँखि नोर टपैक गेलै।दुख-दर्दमे अपन अछि कियो से भान भेलै।एम्हर ठीक नइँ होब’धरि खाना-पिना,सेवा सत्कार सबकिछु शिवानीए करैक।

नित स्याहार आ दबाइसँ आलोकके तबेतमे सुधार भेलै। शिवानीके बहुत बहुत धन्यवाद देलकै।शिवानी मुस्की मारैत its ok baba कहि माथ पर एकटा ‘किस’ ल’ लेलकै।आलोक प्रसन्नताक चरम सीमामे पुगि गेलै।ओहो ‘oh my  jaan ! ‘ कहि अपन छातीमे टासि लेलकै।दुनू एक दोसरके प्रेमालापमे व्यस्त भऽ गेलै। प्रेमक सागरमे अपन जिनगीक नाउ हाँक लगलै।

कहै छै न, जे शुरू केनाइ मात्रटा कठीन छै। तकराबाद सहज छैक।सएह भेलै।आलोक-शिवानीक प्रेमक रथ विभिन्न हिसाबे निरन्तर चल’ लगलै।एक दोसरके परिपूरक सिद्ध होब’ लगलै।चरम आनन्द पाब’ लगलै।एक दिन अच्चानक,शिवानीके उल्टी भेलै,मोन जेहे सेहे पर जाइक.. होस्पिटलमे चेक करेला पर प्रिगनेन्ट बतेलकै।आलोक डराएल डराएल सन लगलै।ओ एबोर्सन लेल जिद्द केलकै। शिवानी नइँ। ई हम्मर प्रेमक पहिल निसानी छै कहि टालि देलकै। दुनियाँके कि कहबै?? अपन घर-परिवारके कि जबाब देबै प्रश्नके उत्तर ओ सहजे देलकै- छुट्टीमे हमर घरबला आएल छलै ओकरे छै कहबै आओर कि???

शिवानीक बातसँ आलोकके ने पूर्ण संतुष्टीए भेलै आ नहिए डर गेलै।जे जेना.. ओकरा सँ दूरी बनेबाक षड्यन्त्र रच लागल मुदा असम्भव…. दिन,महिना बितैत गेलै।आलोक विभिन्न बहन्ने कखनो रूममे त कखनो बाहर रहैत गेलै।एम्हर शिवानीक गर्भवती अवस्था दिनानुदिन बढैत गेलासँ कहियो घरे-कहियो जनकपुर रहैत गेलै।

७ महिना बाद स्कूलमे पढबैत काल अच्चानक आलोकके मोबाइलमे मेसेज एलै-” जानू! I am very हेप्पी।अहूंके बधाइ अछि।अहाँ बाप बनि गेलहुँ।बेटा भेल अछि।रातिए खन २ बजे भेल।मुंह-कान बिल्कुल अहीँ पर गेल अछि।चिन्ता नइँ करु।हम ठीक छी।बहुते मिस करैत छी।बाइ….
आलोकके मेसेज देखिते १०३° बोखार चढिगेलै।मस्तिष्क शुन्य भऽ गेलै। हतपत छुट्टी लेलक।घरपट्टीके पैसा देलक।सिमकार्ड तोड़ि फेक देलकै आ इहो रूम अपर्झटेमे क’ देलकै खाली पहिनहे जकाँ ……

एहि मैथिली कथाक लेखक

विन्देश्वर ठाकुर
धनुषा-नेपाल
हाल: दोहा-कतार 

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