Poem

लवहरि कुशहरि (कविता) डा. महेन्द्र नारायण राम

मिथिला
लोक मानस
अपन माटि-पानि
चिन्तन-परम्परा
आचार-विचार व्यवहार
केर
भूमि
विदेह भूमि
विदेह जनक
विदेह गरिमा
वैदेही दर्शनक
पूर्ण प्रतिनिधित्व करैत
जनिक
शाक्त-साधना लेल
जतs
शक्तिमयी सीताक अराधना
सतत अन्तर्आत्मामे होइत रहैत अछि।।

Ad

राम, लक्ष्मण सङ्ग सीताक
चौदह वर्ष वनवास
चित्रकूट निवास
सिद्ध वनश्री
ई परिसर
सदिखन सिनेह-आदरसँ उलझल
मृगशावक दुलारसँ भरल
जूही लता पुष्प वस्त्रसँ लुबधल
वृक्ष फल भारसँ नमरल
दन्तार वनहाथी
अपन रनिवास आ
मेघ मन्दिर निनादैत
सून्ढसँ
कल्हार, कुमुदिनी, कोका फूल
कुटीर सोझा छिरियबैत
सुग्गा, हरियल, टिलटिल
हेन्जक हेन्ज आश्रम कुन्ज लता बैसल
नील मयूर अपन नृत्य नचैत
चारूभर बाट छेकल
मोन प्रफुल्ल हर्षायल।।

वनवास वनवासे
मोन हृदय मन्हुआयले मन्हुआयल
रावण वध

अशोक वाटिका
सीता मुक्त भेल
राम सीता लक्ष्मण
तीनू
अयोध्यापुरी घुरि अएलाह।।

कुल गुरू वशिष्ठ
बाहु पूजा उत्सव
करबाक निदेश देलाह
राजा-महराजा
देवी-देवता
यक्ष-गन्धर्व
नाग-किन्नर
सभ जुमि गेलाह
शान्ति पाठ भेल
गणपति पूजन आरम्भ भेल
” गणनाम”
उच्चारण भेल।।

आकाश जेना प्रलय घटा घेरि लेल
रहि-रहि अशनिपात होमs लागल
सहस्त्र-सहस्त्र फेरू हुन्कार भेल
शोणितक मुसलाधार बुन्न गिरल
दिशा-दाह अशुभ क्रन्दनक
हृदयविदारक ध्वनि चितकार भेल
हाडक घनघोर बर्षा भेल
आक्रमण
शत्रुक आक्रमण
मायाबी-प्रचण्डक दौर्दण्ड शत्रुक आक्रमण
आकाश मार्गसँ आक्रमण
अस्त्र-शस्त्रक झङ्कार
धनुषक टङ्कार गनगना गेल।।

तत्क्षण
सहस्र-मुख रावण
उपस्थित भs
व्यवधान करs लागल
उपद्रव आरम्भ भs गेल
अयोध्याक सकल सेना आहत भेल
राम आहत भेल
लक्ष्मण आहत भेल
भरत ओ शत्रुघ्न आहत भेल
सभ धराशायी भsगेल।।

ई अनहोनी
नहि देखल गेल
भगवती आद्याशक्ति केर स्मरण करैत
देवी सीता
अकचके तीव्र हुन्कार करैत
राखल तरूआरि लs
फरसा-कुठार लs
बीचहि कूदि गेलीह
सौ-सैकड़ा एक्केसङ्ग
कतोक सङ्घार केलीह
सहस्र-मुख रावणक शरीर
खण्ड-खण्ड पथार कएलीह
बोझक बोझ
हड्डीक टाल-पहाड केलीह
आकाश
जय भगवती सीता
अनोर जोर-जोर उठल
देवगणक दुदुन्भी स्वर बेजोर उठल
पुष्प बर्षा-बून्द घनघोर गिरल
बाहुपूजन
धरती-गगन गुन्जल
शान्तिवरण कुटुम्ब परिवार भरल।।

सीता ननदि कुलामति
तीर-धनुष यज्ञ चित्र उकेरल
एक बियनि सीता हाथ देखलीह
सर्वथा स्वाभाविक परिकल्पना लगलनि

विमोहित भs गेलीह
इर्ष्या-द्वेषसँ भरि गेलीह
सीता-संवाद करs लगलीह
बेस कहू तs भगवती भौजी
दस-मुख रावणकेँ अझक्को देखने हयब कि नहि ?
-नहि कखनो नहि
-हम्मर शपत्त खाऊ तs!
-एहिमे शपत्तक कोन काज
एक बेर मात्र औँठीक नगमे
ओकर
प्रतिबिम्ब देखने रहियैक!
तखन भौजी
बियनि केर दोसर पीठ पर
ओकर मुरूत बना दिअ
जिद्ध कs देलीह
सीता दुखी भs गेलीह
ननदि जिद्ध आगा झुकि गेलीह
मोन तिक्त होइतहु
सकिरीट, सआयुध, कलात्मक रावण-मुरूत बना देलीह
छली कुलामति
मुरूत हाथ लs नाच लगलीह
दौडल-दौडल जा रामकेँ देखा देलीह
राम मोनहि मोन
सीता-सतीत्व पर शँका कs गेलाह
लक्ष्मण बजा राता-राती
गर्भवती सीताकेँ वनमे पठा देलाह।।

वन-प्रान्तर
वर्षा ऋतुमे
अमावस्याक भयङ्कर अन्हार राति
मूसलाधार वर्षा गगन गरजैत छल
आँखि-चोन्हार बिजलता छिटकैत छल
आसिन-कातिक बीतते
प्रचण्ड जाड़ उतरि जाइ वोनमे
अन्तहीन राति
अन्तहीन कुहेस
अन्तहीन जाड़
जाडे़ गाछक पात मर्र-मर्र
वायुक स्पर्श टीश भरल
कनकनी खीस भरल
कोकिल, कीट, पपीहा
मैना, भ्रमर ध्वनि
वोन हुलसित भsरहल
नव पल्लव सज्जित ठारि-ठारि
अंग-अंग कुसुमित-सुस्मित
मधु-मकरन्द झरि रहल
सुगन्धि छितरा आ
सिहकी अगरा रहल।।

सीता बनिसार
समस्त देवलोक भयभीत भs गेलाह
हिनक सुरक्षार्थ
शिव, विश्वकर्मा, भैरव तैनात भs गेलाह
गुरू बाल्मीकि
सीता कुटी सन्निकट
अपन कुटी राखि
सीता-सेवार्थ ऋषि पत्नी, ऋषि कन्या लगा देलाह
तीन मास पश्चात
लवहरि जनम लेल
झं झं झः
झुनुर-झुनुर-देवर्षिक पाजेबक ध्वनि
धान्ग-धान्ग धडाम मृदङ्गक थाप
रिन्ग रे-रिन्ग रे
चै-चुक-चुहुक-चुहुक
नैश पक्षीक स्वर
झीन्-झीन्-झीन् झीन्गुरक झङ्कार
चहु ओर झङ्कृत भेल
नवम दिन
लवहरि कुटी छोड़ि सीता
गंगा स्नान चलि गेलीह
ककरो कहबो नहि केलीह
ताहि बीच कतहुसँ
गुरू बाल्मीकि जुमि गेलाह
सीताकेँ नहि देखि
लवहरि कोरा उठा
अपन कुटी आनि लेलाह
महादेव सेहो पश्चात जुमलाह
ओहो लवहरि कुटी नहि देखलाह
सीताके सेहो नहि देखलाह
सीता लेहाजे एक कुश उपारि
अनमन लवहरि नेना बना देलाह
सीता अइने विचित्र भs गेल
दोसर केर नाम कुशहरि पडि गेल
दुनूकेँ
शस्त्र-शास्त्र शिक्षा देल गेल
सर्वगुण सम्पन्न सभ विद्या निष्णात भs गेल।।

चक्रवर्ति सम्राट राम
बनवासक लालसा एक उत्पन्न भs गेल
अश्वमेघ यज्ञ करबाक ठानि लेल
बालीकरण अश्व छोडल गेल
लवहरि-कुशहरि
अश्व पकड़ि
आश्रम आनि
खुट्टा बान्हि देल
माइ सीताकेँ देखि बालीकरण
पायर गिर सोहराबs लागल
सीता लाख वर्ष जीबाक आशीष दिअ लागल।।

लवहरि-कुशहरि
मायक आशीष लs
रामचन्द्रक राजकीय कमलदह चलि गेल
वनक सभटा फूल तोड़ि लेल
रक्षक बछर वत्सल नाग केर फण पर बोझि
कुशहरि आश्रम आनि लेल
रामचन्द्रकेँ सभ जनतब भेल
शैन्य प्रमुख शाल ओ विशाल भेजल गेल

लवहरि पकड़ि अयोध्या आनि
वनसार दs देल
कुशहरि जनितही आगि भs गेलाह
धनुष-बाण साजि अयोध्या जुमि गेलाह
सात सय पनिभरनीक वस्त्रावरण
अग्निवाण मारि डाहि देलाह
नग्न पनिभरनी
कुशियार खेत नुका गेल
भीषण युद्ध भेल
अयोध्याक समस्त वीर योद्धा मारल गेलाह
शैन्य प्रमुख शाल-विशाल मारल गेलाह
राम,
हनुमान बजा
कुशसरि पकडि
अयोध्या हाजिर केर आदेश दs देलाह
सोझा जखन हनुमान भेल
सीता-पुत्र जानि
दुलार करs मे लागि गेल
राम स्वयं जुमि गेलाह
कुशहरि प्रहार आरम्भ कs देलाह
कुशहरि सेहो कमजोर नहि
डांरसँ छप्पन छुरी निकालि
सभटा प्रतिकार कs देलाह
राम चकित भs गेलाह
परिचय-पात जखन भेल
वात्सल्य भाव स्वयं जागि गेल
सभ सङ्ग
आश्रम दिस विदा भs गेलाह।।

सीता
राम लक्ष्मण अबैत देखि
हृदय कठोर कs लेलीह
धरती दिस ताकि
मुख बकोर कs लेलीह
धरती माइ
पुत्री दुख देखि
बेकल भs गेलीह
एक
चरचराहट भेल
धरती दू खण्डमे बटि गेलीह
माइ सोझा एलीह
प्रणाम केलीह
माइ कोरा समा गेलीह
मर्माहत राम
आत्मग्लानिसँ भरि गेलाह
सरयुमे डूबि
शरीर त्यागि देलाह।।

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लेखक परिचय

डा. महेन्द्र नारायण राम मधुबनी जिलाक खुटौना गाम निवासी छथि। मैथिली साहित्य जगतमे हिनकर अलग ओ विशिष्ट पहिचान छनि। डाक्टर राम अन्तरराष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनक सम्मानित अध्यक्ष छथि। साहित्यक विधासभ जेना – कविता, कथा, संस्मरण, अनुवाद, संपादन, शोध, समीक्षा आदि मे अपन कलम चलौने छथि। लोक साहित्य, लोक संस्कृति, लोक गाथा, लोक देवता आदि विषयमे हिनकर बहुत रास किताबसब प्रकाशित छनि।

कैलाश कुमार ठाकुर

कैलाश कुमार ठाकुर [Kailash Kumar Thakur] जी आइ लभ मिथिला डट कमके प्रधान सम्पादक छथि। म्यूजिक मैथिली एपके संस्थापक सदस्य सेहो छथि। Kailash Kumar Thakur is Chef Editor of ilovemithila.com email - [email protected], +9779827625706

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