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चेतना आ भाषा : डा. राम चैतन्य धीरज

भाषा चेतनाक विशेषता होइत अछि आ चेतना भाषेक रूपमे अभिव्यक्तिमे उत्तरैत अछि। एकर दुई रूप होइत अछि – प्रथम कायिक आ दोसर वाचिक। माने भाषा चेतनाक कायिक आ वाचिक अभिव्यक्तिक माध्यम होइत अछि। कायिक रूपमे ई शुद्ध विज्ञान थिक जे इच्छा ओ अवधारणाकेँ कर्मेन्द्रिय द्वारा स्वंयकेँ अभिव्यक्त करैत अछि, एवं वाचिक रूपमे ई अपन कल्पना तथा अवधारणाकेँ शब्द द्वारा व्यक्त करैत अछि जे अन्ततः विज्ञान होइत अछि। तेँ भाषाकेँ चेतनाक कार्य-कलापक अभिव्यक्ति तथा अभिव्यक्तिक माध्यम कहि सकैत छी।

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चेतना शरीरकेँ भाषेमे (आवधारणा आ विचार) व्यक्त कऽ भाषा बनि जाइत अछि आ ओ पुनः ज्ञान-विज्ञानक मर्यादा लए चेतनामे स्मृतिक रूपमे पसरैत अछि। तेँ भौतिक संसार चेतनाक भाषात्मक प्रसार थिक। हम जे भौतिक संसार देखि रहल छी, ओ चेतनाक परिकल्पनात्मक उपस्थापन आ व्यवस्था थिक। उदाहरणक लेल, प्रत्येक आविष्कृत भौतिक रूप एवं ओकर गति चेतनासँ निस्सरित अछि। तेँ भौतिक संसारकेँ चेतनाक प्रसार एवं विस्तार कहल जा सकैत अछि। जे कि चेतना शब्दमे (भाषा) आकृत होइछ, तेँ शरीरो अव्यक शब्दमे व्यक्त सक्रियता रखैत अछि। तेँ कायिक सक्रियताक अनुसार वाचिक शब्दमे ओकरा व्यक्त कयले जा सकैत अछि। जेना – ‘हम जाइ छी।’ – ई वाचिक अछि आ एहने सन शरीरसँ जएबाक व्यवहार कायिक कहबैछ। तेँ कायिके वाचिक होइछ आ वाचिके कायिक। अस्तु ई कहब अत्युक्ति नहि होयत जे चेतनाक भाषिक सक्रियता शरीर थिक। अर्थात, मस्तिष्कक आदेशमे शरीर भाषिक भऽ उठैत अछि। तेँ शरीरक गति मस्तिष्कक आदेशमे अछि आ इयह गति भाषिक होइत अछि।

प्रश्न होइछ, जे भाषा की थिक ? वस्तुतः जाहिमे संसार भासैत अछि वा लीखाइ दैत अछि, से भाषा थिक। चेतनेक क्रियामे संसार अछि आ ई क्रिया वा शब्दमे व्यक्त होइत अछि आ एकर साक्षात्कारो शब्देसँ होइत अछि। तेँ चेतनामे शब्द क्रिया तथा शब्द क्रियामे शारीरिक सामूहिकताक शब्द सम्बन्ध, आ तेँ ई भाषा भऽ जाइछ।

व्याकरणमे शब्दक समूहकेँ भाषा कहल गेल अछि। मुदा शारीरिक इन्द्रियगत सम्बन्धकेँ जाहि शब्दक सम्बन्धसँ व्यक्त कयल जाइत अछि ओ भाषा थिक। चेतनाक सम्बन्ध इन्द्रियगत व्यवहार तथा अवधारणा आ विचारसँ होइछ, तऽ शब्दक समूह अर्थात भाषा शरीरमे व्यक्त अछि, जे चेतनाक शारीरिक सम्बन्धसँ साक्षात्कार करएमे सक्षम छथि, ओ भाषाकेँ वा शब्दक समग्रताकेँ बूझि सकैत छथि। शरीर भाषा थिक आ मस्तिष्क भाषाक आदेश केन्द्र जे इन्द्रियानुभूतिक संग सांसारिक सम्बन्धमे भाषिक रूपमे गतिशील रहैत अछि। तेँ हम शरीरकेँ भाषा कहैत छी। पहिल मनीषि जे स्वयंसँ आत्म-साक्षात्कार कएलनि वएह चेतनाक संग शरीरोकेँ देखलनि जे भाषाक सम्बन्धक अन्तर्गत गणितीय सेहो बनौलनि। चेतना योग करैत अछि, निषेध करैत अछि, विभाजन करैत अछि तथा योगक गुणा करैत अछि। इयह चारिटा प्राकृतिक गणितीय सम्बन्ध शरीरमे दृश्य तथा अदृश्य अछि।

दसटा आंगुर हाथक वा दसटा पैरक – इयह दस तऽ प्राकृतिक संख्या होइत अछि आ एहो संख्याक आधार तीनिटा अंक शुन्य लगाकए चारिटा अंक होइछ जे चेतना वायु, प्राण आ जीवक अभिप्राय रखैत अछि। चेतना शब्दक क्रियाक प्रवाह थिक, जकरा हम शून्य कहि सकैत छी। वायुकेँ एक, प्राणकेँ दूई तथा जीवकेँ तीन आ एकर जैविक सम्बन्धकेँ योग, निषेध, विभाजन तथा गुणा कहि सकैत छी। विभाजन निषेधक कारणेँ होइत अछि तथा गुणा योगक कारणे होइत अछि। अस्तु योग तथा निषेध इयह गणितीय क्रिया मूलतः संसार गतिशीलता थिक जकरा भावा-भावे, आवृति-निवृत्ति, प्रवृत्ति-निषेध आदि द्वैत भाव सेहो कहि सकैत छी – ई ज्ञान एक मात्र आत्म साक्षात्कार वा चेतनाक ज्ञानेसँ सम्भव भऽ सकैत अछि। तेँ शारीरिक भाषाक प्रत्यक्षण भेलाक बाद ई निष्कर्श स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे शरीर चेतनाक भाषिक विस्तार थिक।

प्रायः लोक पुछैत छथि जे पहिने मुर्गी वा पहिने अण्डा। ई प्रश्ने भ्रामक अछि। जँ प्रश्नकर्ता प्रकृति विज्ञानसँ अवगत छथि तँ ओ जनैत हेथिन जे जीवक सृष्टि आकस्मिकसँ क्रमिक विकासक क्रममे भेल अछि। पृथ्वी पर पहिने आकस्मिक रूपेँ एक कोषिय जीव आयल आ पुनः क्रमिक गतिएँ जहिना-जहिना वातावरण वा पर्यावरण परिवर्तन होइत गेल, तहिना-तहिना अण्डज तथा अण्डजमे पिण्डजक अस्तित्त्व अबैत गेल आ ई क्रम प्राकृतिक उत्परिवर्तनक संगहि चलैत रहल। तेँ अण्डामे चेतनाक शब्द पिण्ड बनल आ ओ क्रमशः कालक्रममे मुर्गीक रूप ग्रहण कऽ लेलक। अण्डा चेतनाक शब्द पिण्ड थिक, जे ओहि अण्डामे आकृत होइत अछि आ एकटा शब्द क्रियात्मक गतिशील पिण्ड अर्थात, चेतनायुक्त शरीर चलए-बुलए लगैत अछि। तेँ ‘पहिने के ?’ एहन प्रश्ने भ्रामक अछि। पृथ्वी पर जतेक जीव आयल सभ क्रमिक गतिसँ उत्परिवर्तनक क्रममे आयल। चेतना अण्डज रूप लेलक फेर पिण्डज रूप लेलक आ तत्पश्चात शब्द गतिमे आयल।

एहि संसारमे एकहि चेतना योग आ निषेध क्रियामे अनन्त रूपात्मक अछि। चेतना शरीरक शब्द-क्रिया थिक जकरा भाषा कहल जाइछ। मनुष्य वाचिक आ कायिक दुनू क्रियामे अछि, मुदा अन्य जीव मात्र कायिक भाषामे कायिक क्रियामे अछि। अस्तु, ई कहब अत्युक्ति नहि होयत जे शरीर वा संसार चेतनाक व्यवहारिक भाषा थिक, तेँ एकर परिचय एकहि चेतनाक अनन्त रूपमे होईत अछि।

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कैलाश कुमार ठाकुर

कैलाश कुमार ठाकुर [Kailash Kumar Thakur] जी आइ लभ मिथिला डट कमके प्रधान सम्पादक छथि। म्यूजिक मैथिली एपके संस्थापक सदस्य सेहो छथि। Kailash Kumar Thakur is Chef Editor of ilovemithila.com email - [email protected], +9779827625706

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