मैथिली अनुवाद _मोहन कुमार महतो

हमर नाम साक्षी यादव हइ। हम अभि २१ वर्षके भेलियै। हम कक्षा १२ मे पढ़ैत एकटा विद्यार्थी सेहो छी। हम अपन परिचय दैत हमरा लागि नै छोरबला पक्ष हइ मातृभाषा । हमर स्कुलमे सभेजना नेपाली आ अंग्रेजीएमे बोलै हवे। लेकिन हमर मातृभाषा नेपाली नै, मैथिली हइ। हमर घर परिवारमे मैथिलीए मे बात होइ हइ। आब बानीए परि गेलै। हम आब नेपाली मज्जासे बोलि लै छियै आ लिखियो लै छियै । अपना बारेमे कोइ पुछिते हमरा ई दुटा बात झट्ट दऽ याद आइब जाइ हइ हम आ हमर माए,माएके याद अबिते हमर भाषा ! अपन भाषाके बारेमे हमरा अतेक याद हइ कि हमरा हमर दाइ सभेदिन सुते से अगाड़ी एकटा खिस्सा सुनैबतै । ऊ मैथिलीएमे रहै छेलै। हम अपन कान खार क’ के सुनै छेलियै । कहियो माइ से सुनै रहियै त कहियो बाबू से । ऊइ खिस्सासबमे से हमरा सबसे बेसि निमन लागेबला ” बगियाके गाछ ” “गोनू झाक खिस्सा” “तारा तारीमे झगरा भेल एक तारी रुसल गेल..” हइ।

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ओना त हम घरमे अपने भाषामे टियुशन पढ़लियै ।लेकिन जहियाया हम कनि बढ़का भेलियै,तहिए पहिलेबेर स्कुल गेलियै । हमर पहिले दिन ,हम झनाक सन लागलै। कथु नै बुझ सकलियै। सर कथि कैहके चलि गेलै,हमर दिमागके मालुम नै होइ सकलै। बादमे सुगा जेना बोलिके जेना-तेना हम नेपाली सिखलियै। ई हमरा भाषा कैला पढ़े परै हइ कैहके हमरा बच्चा दिमागमे तहिया कहियो सवाले नै एलै।लेकिन अपन भाषामे पढ़ पाबि तँ अहुसे बेसी मज्जा अबितै से बात हमरा जेना आगिसे पाकि जेबही बौवा ! कहल जतबे सही लगै हवे । अस्सली बात चिन्ह सकेबला गुण तँ आइबे गेल रहइ। सरके सुनौलहा ऊ खिस्सासब हमरा दाइके सुनौलहा खिस्सा जेहन कहियो निमन नै लगलै । नै त हमर हृदयतक पुगल होतै।

नेपाली मातृभाषासब कते भाग्यमानी हइ।

उसब जोन भाषामे बोलै हइ ओही भाषामे पढ़ै हइ । ओही भाषामे लिख पबै हइ।ओकर बाबू माइके कथा सुनेमे आबैबला मज्जा आ सरके स्कुल मे पढ़बके मज्जा ओहने अबैत होतै। लेकिन हम एकटा गैर-नेपाली भाषी अभागी जेहने छी । दोसरके भाषामे लिखैत पड़त तँ, पन्नाके पन्ना लिख सकबै । पढ़ सकबै। लेकिन अपन भाषा कहियो पढ़ नै पौलियै । हमर माइके अपने भाषामे एकटा चिठ्ठी लिख नै अबै हइ। केहन ज्ञानी भेलियै हम? लगै हइ कोयली अपने गीत बिसैर क’ आब कौवाके गीत गाब लगलै। हम एकटा पहिचान हरेलहा कोयलीए छी । जे आब कौवाके गीत गबैत रमाइ हइ।

लगै हइ कोयली अपने गीत बिसैर क’ आब कौवाके गीत गाब लगलै। हम एकटा पहिचान हरेलहा कोयलीए छी । जे आब कौवाके गीत गबैत रमाइ हइ।

-साक्षी

शिक्षा ज्ञान दै हइ। भाषा ऊ ज्ञानके दिमाग आ दिल तक पुगाबके काम करै हइ। तहिसे हमरा लेल सरल आ जल्दी ज्ञान पुगाबला भाषा नेपाली नै होब सकतै । ऊ हमर मातृभाषा मैथिली होब सकतै । कैला कि एकटा विद्वान कहले हइ” दोसर भाषा लोकके दिमागतक पुगै हइ लेकिन मातृभाषा लोकके दिमाग आ दिल दुनुतक पुगै हइ। एकटा विद्वान इहो कहले हइ कि

” इ संसारमे जिवके लागि दोसरके भाषा बोल आबही परै है लेकिन सभेदिन जिवके लागि अपने मातृभाषा बोल परै हइ ।

२०७७- कातिक-१२ गते (साक्षी यादव)
महोत्तरी, प्रदेश नं.२

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