ई कोन जुग एलै गै माइ…

मनके बिहारिमे साँस सम्हारैत
सन्निपात गहने तड़पैत लोक
मरण मातमके गन्धमे
अफरा-तफरी मचाबैत लोक

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आङ्गनसँ उसरैत इजोत सङ्ग
उदास बेहाल बिलखैत लोक
बेवश लाचार ठाढ़ जिनगी
बन्द खिड़की केबाड़सँ ताकैत लोक

ई कोन जुग एलै गै माइ

बन्द आँखिसँ बैसकʼ एक क्षण तँ
सोचिकʼ हाल सहमैत लोक
हौसला जनमाबैत पुनः
दौडैकʼ लक्ष्य थामने, पिघलैत लोक
कारी कुप्प अन्हार चारूदिस
आशक डोर पकड़ने ठिठुरैत लोक
सजाएल गन्हाएल लहास
अप्पन कन्हांपर छै ढोबैत लोक

ई कोन जुग एलै गै माइ

धरने रहूँ धीरज अन्तिम साँसधरि
परिवर्तनक चक्रसँ कहाँ अलग छै लोक
असत्य अहंकारके तांडव बीच
जोरबा दी बुद्धा ( बुद्ध) गुनगुनाबैत लोक
उदय सघन शान्ति अन्तसमे
होस सधने खिलखिलाबैत लोक
सजग सुखासन अकंप प्रतिक्षा
धीयान, प्रेम,आनन्दसँ छलकैत लोक

ई कोन जुग एलै गै माइ ।

स्वामी शैलेन्द्र

सिरहा

सम्पादकके कहब :

स्वयंके ज्ञान रखनिहार वा आध्यात्मिक दृष्टीसँ जीवनके निरीक्षण कएनिहारकेँ स्वामी कहल जाइत छै। प्रस्तुतकर्ता स्वामी शैलेन्द्र जी सेहो ओही पथक यात्री रहल जानकारी हुनके रचनामे भेटैत अछि। साँस, कारी कुप्प अन्हार, लहास आदि असत्य, अज्ञानता, संघर्ष, जिनगीके अनुभूति छियै। तहिना धीयान, साक्षी भाव, प्रेम, आनन्द आदि लोकके सत्य प्राप्तिक लक्षण रहल कविताके गहीर भाव अछि। कविताक लेल हार्दिक आभार।

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